Tuesday, October 2, 2012

विकास की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण गरियाबंद जिला

गरियाबंद जिला का मानचित्र 


















प्रशिद्ध भूतेश्वर नाथ शिवलिंग विश्व का सबसे बड़ा स्वयम्भू शिवलिंग 

 विकास की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण गरियाबंद को जिले का दर्जा मिलने पर अब वहां जनता की तरक्की और खुशहाली का नया दौर शुरू होने जा रहा है।
कुछ क्षेत्र जो अभी तक जिला मूख्यालय अविभाजित रायपुर से काफी दूर पर स्थित थे उन्हे भी अब विकास की एक नई किरण नजर आने लगी है। क्षेत्र मे कई ऐसे क्षेत्र है, जहां अभी तक विद्युत व्यवस्था भी नहीं पहुंच पाई है। सड़क व्यवस्था स्कूल के जैसे अनेक सुविधा से वंचित थे। उन्
हे अब विकास की झलक दिखाई देने लगी, पूर्व में गरियाबंद जिला जब रायपुर जिले में था तब कई ऐसे गांव जैसे देवभोग, रसेला, लिटीपारा,नवागढ़ ,अमली पदर , गोहरा पदर उरमाल मैनपुर    के वासी अपने आप को जिला मुख्यालय से काफी दूर महसूस करते थे, परंतु रायपुर जिला से अलग होने के गरियाबंद स्वयं जिले के रूप में अपने अस्तित्व में आ गया हैं, गरियाबंद रायपुर जिला से अलग होने के बाद विकास तो होगी ही वहीं इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संपदा छिपी हूई है, इसके कारण भी क्षेत्र का विकास अधिक होगा गरियाबंद जिला में राजस्व की प्राप्ति हो काफी मात्रा प्राप्त होगा ही, प्राकृतिक संपदा में हिरा अलेकजेन्डर, हरा सोना तेन्तुपत्ता, आमामोरा में औशधि, क्षेत्र में निर्मित   सिकासार बांध आदि है। जिन्हें देखकर क्षेत्र को अत्यधिक विकसित क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है। विकास कार्यो में क्षेत्र की तस्वीर बदल गई है। अब वन आंचल गरियाबंद क्षेत्र को सम्पूर्ण जिला बनाकर विकास की दृश्टि कोण से छत्तीसगढ़ राज्य में प्रथम जिला के रूप में उभर कर सामने आऐ यही गरियाबंद जिला में आने वाले पांचों ब्लाक के गरियाबंद, फिगेष्वर, छुरा, मैनपुर, देवभोग, की जनताओं का शासन प्रशासन से यही दरकार हैं। सड़क, शिक्षा, व स्वास्थय की मूलभूत दिक्कते राज्य निर्माण के बाद कुछ हद तक दूर हुई है। अब जिला बनने के बाद मूल भूत सुविधा के साथ प्रशासनीक कसावट आने से तेजी से अग्रसर होने की संभावनाएं आम नागरिक रखते हैं। जिलेका गौरव सिकासार डेम 1977 में निर्माण हुऐ सिकासार डेम गरियाबंद क्षेत्र के किसानों के लिए वरदान साबीत हुआ है। सिकासार डेम की उपयोगिता किसी से छुपी नही हैं। इस डेम का भराव छमता 1333 एमसीएफटी हैं। जिससे साढे 400 सौ ग्रामों के लगभग 29 सौ हैक्टेयर खेतों में सिकासार डेम के पानी से फसल लहलहाती है। इससे किसानों को चिन्ता नही रहती। ग्रीश्म कालीन रवी फसल के लिए किसानों को पर्याप्त मात्रा में पानी मिल जाता है। इस तरह एक नही दो-दो फसल लेते है। जो गौरव की बात है। शिक्षा के लिए पर्याप्त महाविद्यालय मुख्यमंत्री रमन सिंह के सौगात से गरियाबंद जिला में कला विज्ञान, कामर्स, आईटीआई, साईस, शासकीय पलेटेक्निक कालेज षूरू हो चुका हैं वही छुरा, देवभोग में भी शासकीय कालेज शिक्षा अध्यन कर रहे छात्र। बस कमी हैं तो विशय वार शिक्षकों की चाहे वह प्राथमीक शाला से लेकर उच्च शिक्षा तक की बात हो। जिला बनने के बाद लोगों में आशा की एक नई किरण कि अब उक्त शिक्षा के लिए शिक्षकों की गरियाबंद जिला में शिक्षा के दृश्टि कोण से पीछे नही रहेगा। वहीं किसी भी क्षेत्र का विकास वहां कि शिक्षा से होता हैं।
गरियाबंद जिले में पाए जाने वाला गौर 

गरियाबंद के ऊपर कलिछाव इसी जगह पर  गरियाबंद को डुबाने वाली योजना बनने वाली है बरूका है डेम 


छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वनभैसा का  ओरिजनल ब्रिड सिर्फ गरियाबंद  जिले में पाया जाता है

प्रशिद्ध झरना देवधारा

जिले का प्रमुख आय  का जरिया  हरा सोना तेन्तुपत्ता

 वन संपदा से परिपूर्ण गरियाबंद के कुछ हिस्सों को छोड़ दे तो प्राय: वनआच्छादित जिला कहलाने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। वही वन संपदा के साथ जैसे बेस किमती इमारती लकड़ीयों के साथ-साथ अनेक प्रकार के वनोशोधि क्षेत्रों में बहुताऐ रूप में पाऐ जाते है। यहां वनों उपज से संबंधित उद्योगों की सम्भावनाएं बलवती होने लगी है। लोगों में जिससे वन आंचल के आय के साथ-साथ बेरोजगारी भी दूर होगा। हिल स्टेषन जिला मुख्यालय से 75 किमी दूर स्थित पहाडी पर बसा आमामोरा किसी हिल स्टेषन से कम नही है। यहां कि प्राकितिक छटा देखते ही बनती है। समुद्र तल से 2000 फिट की उचाई पर बसा आमा मोरा को ग्राम पंचायत का दर्जा तो हासील है। लेकिन आज तक यहां के कमार भंजियां जन जाति के लोग जंगल से ही गुजर बसर करते हैं जो विकास से अब भी पीछे है। अदभूत झरने और प्राकितिकसौदर्य- दुर्गम पहाडी पर अदभूत झरने देखने को मिलते है। जोवपारा के पास कलराव गीत गाता झरना, फरीपगार, आमामोरा के पास डरावनी अवाज करता झरना, ओड के पास बनियाधस जो मोतियों की माला बनाता प्रतीत होता है। प्रकृति ने आमामोरा पहाडी को खूबसूरत बनाया है। ऊचे-ऊचे पहाड़ घने वन कलकल करती नालों का संगीत बरबस ही मन को षाति प्रदान करती है। वन परिक्षेत्र धवलपुर को अंतर्गत वनों से ढके होने के कारण आमामोरा, ओड़ में हिरण, बारहसिंगहा , जंगली सुवर, भलु, सोनकुत्ता, तेदुआ, नीलगाय, अंधिकाष पाए जाते है। उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व नवगठित जिला में एक और उपलब्धी केन्द्रशासन द्वारा प्रायोजित उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व भी अस्तित्व में आ गया है। नवगठित उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व में आने के बाद क्षेत्रों मे वन जिवों के संरक्षण के प्रयास तेज हो गये हैं। एक जनवरी 2012 से गठित टाइगर रिजर्व कुल आठ रेंज का उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व बन गई है। जिसमें बाघ के साथ तेंदुआ, निलगाय, हिरण, तथा वनभैसा, की गणणा की जाऐगी। बेस किमती हीरा खदान गरियाबंद जिले के मैनपुर थाना अंतर्गत प्रदेश की बहुचर्चित पयली खण्ड़, सोनमुडा, की हीराखदान है। जहां अवैध खुदाई तस्करों के द्वारा किया जा रहा हैं । जिला बनने के बाद इसकी सुरक्षा के लिए विशेष दयान दिये जोन से ही इस जिले के किमती हीरा को सुरक्षा निष्चित हो पाईगी। एसी संभावनाएं आम लोगों द्वारा नये जिले गरियाबंद के निर्माण होने से है।
 
माँ जतमाई प्रकृति का अनूठा नजारा 

गरियाबंद जिले में पाए जाने 

हिरा खदान का मेन गेट 

सिकासार बांध

Tuesday, September 25, 2012

आने वाले समय में नाव की सवारी एक तरह से लोगों के लिए स्मृति मात्र रह जाएगी।

 आज भी पैरी नदी के मोहेरा घाट पर नाव दो जिलों को जोडऩे का सेतु बन रहा है। बीते रवि वार को मै अपने साथी विजय सिन्हा के साथ घुमते घूमते गरियाबंद जिला मुख्यालय से ७ की मिदुर मोहेरा घाट पहुचे वहा नाव को चलता देख बाद ही आश्चर्य और ख़ुशी भी हुई वहा हम लोगो ने नाव का सफ़र किया और नाव में उपस्थित लोगो से चर्चा किया तो बताये की गरियाबंद और धमतरी जिले को जोडऩे के लिए यहां नाव का सफर ही वर्षों से एक
 अनूठा रिश्ता कायम किए हुए है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी ग्रामीणों को नाव से नदी पार करके गांव जाना पड़ रहा है। नाव के सेतु ने दोनों जिलों के जिन संबंधों की बुनियाद रखी है उसे और मजबूती देगा यह नया बनने वाला पुल। व्यापारिक व सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस नदी के निर्माणाधीन पुल से विकास को गति मिलना तय है। 



ग्रामीणों में खुशी इस बात की है कि राज्य सरकार ने उनकी सुध ली है। पुल के निर्माण से नाव का सफर नहीं करना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पुल का निर्माण हो रहा है। गरियाबंद और धमतरी जिले को जोडऩे के लिए यही नाव का सफर ही वर्षों से एक अनूठा रिश्ता कायम किए हुए है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी ग्रामीणों को नाव से नदी पार कर कर गांव जाना पड़ रहा है। इन दिनों नदी में लोगों को नाव के सहारे इधर से उधर जाते देखा जा सकता है। धमतरी जिले का ग्राम मोहेरा पैरी नदी के मुहाने पर गरियाबंद के नजदीक बसा है।

उल्लेखनीय है कि ग्रामीणों के लिए नाव की यह सवारी वर्षों पुरानी है। अब एक दो वर्षों के भीतर ही नाव का यह सफर भी इन्हें नहीं करना पड़ेगा क्योंकि 9 करोड़ की लागत से बड़े पुल का निर्माण किया जा रहा है। फिलहाल इसका कार्य अधूरा है। नाव चलाने वाले महेश कमार ने बताया कि रात सात बजे तक वह नाव से लोगों को नदी पार कराते हैं। वहीं ग्रामीण योगेश्वर ने बताया कि आने-जाने के नाव का किराया बीस रुपए है। यह ग्राम मगरलोड जनपद पंचायत के अधीन पड़ता है।

मोहेरा के आसपास करीब 7 ग्राम पड़ते हैं जो गरियाबंद से समीप हैं। यहां के लोगों की आवाजाही गरियाबंद रोज होती है। क्षेत्र के स्कूली बच्चे भी गरियाबंद करने नाव से ही जाते हैं। इसके अलावा व्यापारिक दृष्टिकोण से धमतरी जिले के समस्त ग्राम गरियाबंद से जुड़े हैं। सभी का सेतु नाव ही है। आने वाले समय में नाव की सवारी एक तरह से लोगों के लिए स्मृति मात्र रह जाएगी।
 








Wednesday, May 23, 2012

मालगांव पहाड़ी पर ही बनेगा कलेक्टोरेट

                                                    मालगाव के पहाड़ी के ऊपर से मनोरम नजारा 






जिला बनने के चार माह के बाद अब यह तय हो गया है कि कलेक्टर का स्थायी दफ्तर मालगांव की पहाड़ी पर ही बनेगा। कलेक्टर दिलीप वासनीकर की मौजूदगी में अधिकारियों की मंगलवार को हुई है बैठक में अधिकारियों ने एक राय होकर इसकी घोषणा की। वर्तमान ने कलेक्टर का अस्थायी दफ्तर कालेज भवन से संचालित हो रहा है। 

बैठक में राज्य शासन को एक सप्ताह के भीतर कंपोजिट जिला कार्यालय का भवन बनाने का प्रस्ताव भेजने का निर्णय लिया गया। मालगांव पहाड़ी में करीब 110 एकड़ शासकीय भूमि है। इस स्थल पर कलेक्टर भवन के समस्त दफ्तर बनाने सभी अधिकारियों की राय ली गई। आखिर में आमराय से नगर में जगह की कमी के चलते पहाड़ी को कलेक्टोरेट के लिए उपयुक्त माना गया। कलेक्टर ने जल संसाधन के कार्यपालन यंत्री विजयकुमार शेष त्न पेज १६ 

वच्छानी और पीएचई के नोडल अधिकारी जीएल गुप्ता को मालगांव पहाड़ी के नीचे एनीकट बनाकर ऊपर जिला कार्यालय भवन व गरियाबंद शहर को पानी प्रदान करने के संबंध में प्रोजेक्ट तैयार करने के निर्देश दिए। 

उल्लेखनीय है कि मालगांव पहाड़ी में स्थायी दफ्तर बनाने संघर्ष समिति तक बनाई गई, जिसने अनेक बार प्रशासन को ज्ञापन भी दिया। रायपुर कलेक्टर रोहित यादव ने तो पहले ही मालगांव पहाड़ी को जिला कार्यालय बनाने फाइनल कर दिया था। गरियाबंद से चार किमी दूर पैरी नदी के बाद पहाड़ी स्थित है। यहां जाने के लिए वर्तमान में कच्ची सड़क है। यह स्थान राज्यमार्ग से लगा हुआ है। जिससे यहां तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए यही कलेक्टर दफ्तर बनाने का निर्णय लिया गया। यह पहाड़ी खूबसूरत लोकेशन में है। कई बार सर्वे करने के बाद अधिकारियों ने मालगांव पहाड़ी को ही जिला दफ्तर बनाने के लिए चयनित किया है। 

Tuesday, May 15, 2012

गर्मी में आम लोगों की भ्रांति ही पशु-पक्षी भी पानी के लिए तरस रहे हैं।

 गर्मी में आम लोगों की भ्रांति ही पशु-पक्षी भी पानी के लिए तरस रहे हैं। भटक रहे हैं।तेज धूप व वाष्पीकरण से नदी, तालाब का जल स्तर तेजी से घट रहा है। इससे आम लोगों के साथ ही पशु-पक्षी भी पानी के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। इस दौरान पशु-पक्षी भी पानी की खोज में रहते हैं। गांव में गिरते भू-जलस्तर और मानसून के लेट आने से सभी ग्रामीण चिंतित हैं। ग्राम नहरगांव के तालाब में पानी कम है। 
 तालाब में काफी संख्या में मवेशी जमा रहते हैं।
  यहां किसान नदी, नाले में बोर कर खेतों की प्यास बुझा रहे हैं। 
  गांव के छह मासी नाला में किसान बोर कर रबी फसल की सिचाई में पानी का उपयोग कर रहे हैं। इस ब्लॉक के तहत कई गांव हैं।
 गर्मी में आम लोगों की भ्रांति ही पशु-पक्षी भी पानी के लिए तरस रहे हैं। भटक रहे हैं। पानी के लिए संघर्ष करते ऐसे पशु, पक्षियों को इस समय आसानी से देखा जा सकता है। जिला मुख्यालय के पास शनिवार के दोपहर में ग्राम नागाबुड़ा की बोलती ये तस्वीरें कुछ यहीं बयां करती हैं। तालाब के किनारे काफी संख्या में पक्षी एकत्र होकर अपनी प्यास बुझा रहे हैं। 
        
 नागाबुड़ा तालाब में सड़क के किनारे पक्षी इक्ट्ठा हुए हैं। अपनी प्यास बुझाकर ये पक्षी पानी में अंगड़ाइयां लेते रहते हैं

साल बीज के संग्रहण में जुटे ग्रामीण



अंचल के बीपीएल परिवार और गरीबों का एक मात्र कमाई का जरिया वनोपज संग्रहण कर जीविकोपार्जन करना है। गर्मी में ग्रामीण महुआ, तेंदूपत्ता व साल बीत का संग्रहण करते हैं। पिछले बीस दिनों से जंगल में ग्रामीण तेंदूपत्ते की तोड़ाई कर रहे थे। अब पत्ता कम होने से साल बीज संग्रहण के कार्य में ग्रामीण जुट गए हैं।

  साल बीज की विदेशों में बारी डिमांड है। पूर्व वन मंडल उदंती में साल के वृक्षों की बहुतायत है। साल बीज की खरीदी वन समिति के माध्यम से की जाती है। जानकारों के मुताबिक साल बीज का उपयोग साबुन व चाकलेट बनाने में किया जाता है। इंग्लैंड व जापान में नारियल के मक्खन व चाकलेट उद्योग में बखूबी किया जाता है। 
 साल बीज से हिंदुस्तान में चाकलेट बनाने की अनुमति नहीं है। लिहाजा विदेशों में ही साल बीज से चाकलेट बनाया जाता है। साल बीज का साल्वेंट सयंत्र में प्रसंस्करण कर तेल निकाला जाता है।

           साल बीज की 500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से समिति के माध्यम से खरीदी प्रारंभ हो गई है। 
     

Wednesday, April 18, 2012

आज से छत्तीसगढ़ में ग्राम सुराज का आगाज

किसान रथ के माध्यम से हर दिन हर ब्लाक में  कृषि संगोष्ठी कृषक मेला आयोजित किया जायेगा 
ग्राम सुराज अभियान में सुराज दल गांवों में पहुंच कर दिन-प्रतिदिन की सुविधाओं और शासकीय कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से जुड़े लगभग डेढ़ सौ से अधिक सवाल ग्रामीणों से पूछेंगे।
अधिकारी व् जनप्रतिनिधि ग्राम सुराज को सफलता की ओर ले कर चल पड़े  


 सभी विभागों का स्टाल के माध्यम से लोगो को योजनो व् जरुरी जानकारी देते हुए 
आधिकारिक जानकारी के अनुसार अभियान के दौरान गांव की प्रमुख मांगों और समस्याओं की जानकारी एकत्र की जाएगी।राज्य में हर साल आयोजित किए जा रहे ग्राम सुराज अभियान से वास्तव में चमत्कार हुआ है। इस अभियान में शासन और प्रशासन के दूर दराज गांवों तक आम जनता की दहलीज पर पहुंचने से जनहित की अनेक नई योजनाओं का जन्म हुआ है और कई योजनाओं में नियम प्रक्रियाओं का सरलीकरण भी किया गया है।  

Thursday, March 22, 2012

आंकड़ों में मिटी गरीबी

गरीबी की वास्तविक रूपरेखा और विस्तार को लेकर अंग्रेजी राज के जमाने से ही लगातार अर्धसत्?य पेश किया जाता रहा है। आजादी के बाद सरकारों से उम्मीद थी कि कम से कम अब गरीबों के सच को सामने रखकर नीतियों का निर्माण करेंगी और गरीबों की हिस्?सेदारी और हक के प्रति न्?याय का भाव रखेंगी। लेकिन 21वीं सदी के पहले दशक में भी सरकार के नवीनतम अनुमान और मापदंडों से हर समझदार आदमी चकरा जाएगा। आज जब यह कहा जा रहा है कि शहरों में 28 रुपए और गांव में 22 रुपए प्रतिदिन खर्च करने वालों को गरीबी की रेखा से ऊपर मानें, तो देश चौंक गया है। 

अभी कुछ हफ्ते पहले इसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे में कहा था कि 32 रुपए और 26 रुपए की कमाई करने वाले क्रमश: शहरी और ग्रामीण लोगों को हम गरीबी की रेखा से ऊपर मानें तो बेहतर होगा। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोड़ी रथ और दांडेकर ने यह पैमाना प्रस्तुत किया था कि हम आमदनी की बजाय अगर उनके लिए जरूरी भोजन में कैलोरी की खपत के मापदंड को इस्?तेमाल करें तो बेहतर होगा क्योंकि वस्तुओं की लागत और कीमत घटती-बढ़ती रहती है। 

रथ और दांडेकर के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 2100 कैलोरी और शहरी क्षेत्र में 2400 कैलोरी आहार पाने वाले व्यक्ति को हम गरीबी की रेखा से ऊपर मानेंगे तो बेहतर होगा। लेकिन आज यह देखा जा रहा है कि गरीबी के आंकड़ों को लेकर कें?द्र सरकार उन राज्?यों से भेदभाव करने की कोशिश करती है, जहां विपक्षी दलों की सरकारें हैं। केंद्र के अनुदान की मात्रा का घटना-बढऩा इस गरीबी की रेखा से उत्पन्न आंकड़ों पर निर्भर करता है। 

आखिर हम क्या कर रहे हैं। सरकार अगर समाज के सामने सच बोले तो कड़वा से कड़वा सच स्?वीकार करने को भी समाज तैयार होता है। लेकिन अगर सरकार की तरफ से पवित्र भाव से भी अर्धसत्?य बोला जाए तो उसकी स्थिति युधिष्ठिर जैसी होगी। इसी समाज ने युधिष्ठिर जैसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति और शासक को उसके अर्धसत्य की वजह से माफ नहीं किया था। 

वस्?तुत: आज देश में गरीबी को लेकर पांच तरह के अनुमान चल रहे हैं। योजना आयोग ने ही दो अनुमान दिए हैं, जिनके अनुसार 21.8 प्रतिशत और 27.5 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं। जबकि इसी सरकार की बनाई अर्जुन सेनगुप्?ता समिति ने यह सिद्ध किया कि 78 प्रतिशत लोगों की क्रय शक्ति 20 रुपए से भी कम है। विश्व बैंक ने कहा है कि भारत में उदारीकरण के 20 साल के बावजूद अभी भी कोई 42 प्रतिशत लोग अत्यंत निर्धन हैं जबकि सुरेश तेंडुलकर कमेटी ने इसे 37 प्रतिशत बताया। 

आंकड़ों का उलटफेर यह दिखाने के लिए है कि सरकार जिस रास्?ते पर चल रही है, उससे गरीबी घट रही है। लेकिन सरकार के इन आंकड़ों पर संदेह करने के वाजिब वजहें हैं कि देश में पिछले 5-7 वर्षों में 8 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से ऊपर उठ गए। अगर ऐसा होता तो सबको दिखाई पड़ता। हां, इतना तो दिखाई पड़ा है कि लगभग 50 लाख लोग बिहार में गरीबी की रेखा के नीचे और चले गए। यह भी दिखाई पड़ रहा है कि उन सभी इलाकों में गरीबी फैल रही है जिसे लाल पट्टी कहा जा रहा है। आंध्र प्रदेश के तटीय गांवों से लेकर भारत-नेपाल सीमा के ग्रामीणों के बीच गरीबी का विस्?तार हो रहा है। गरीबी घटने से माओवाद का असर जरूर घट जाता। 

आज जब गरीबी के सवाल चौतरफा उठ रहे हैं, योजना आयोग का यह दावा हास्यास्पद है कि मौजूदा आर्थिक नीतियों के कारण गरीबी घटी है। ये दावे आज ही नहीं हो रहे हैं। इंदिरा गांधी के जमाने में भी बैंकों के राष्?ट्रीयकरण के जरिए गरीबी हटाने के दावे किए गए। बैंक कर्ज दे रहे थे, लेकिन वह बिचौलियों की जेबों में जा रहा था। परिणामस्वरूप गरीबी हटने की बजाय भ्रष्टाचार के खिलाफ 1974-75 में गुजरात से लेकर बिहार तक सरकार को जन विस्फोट का सामना करना पड़ा। ये आंकड़ेबाजियां महज छलावा के लिए हैं। 

तटस्थ अर्थशास्त्रियों के मुताबिक 15 वर्षों में प्रतिदिन 2400 कैलोरी से कम आहार लेने वालों की ग्रामीण भारत में तादाद 74 प्रतिशत से बढ़कर 2004-05 में ही 87 प्रतिशत हो गई थी। ये आंकड़े बच्?चों व महिलाओं में कुपोषण की भी कहानी कहते हैं जिस पर प्रधानमंत्री को भी कहना पड़ा कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषणग्रस्त लोगों का राष्?ट्र हो गया है। 

यही स्थिति बुनियादी सुविधाओं की है। 40 प्रतिशत से अधिक लोगों के घरों में पीने का पानी या पक्की छत नहीं है। यह भी देखें कि इस बीच पिछड़े तबकों के लिए रोजगार के अवसर घटे हैं वरना मनरेगा के न्यूनतम मजदूरी वाले कामों में इतनी तादाद में लोग नहीं जुट जाते। 

यह रोजगारविहीन वृद्धि का जमाना है, और कृषि में निवेश घटा ै, फिर कहां से गरीबी के खिलाफ लोगों के पास अवसर और साधन आ रहे हैं। आज अगर इसका क्षेत्रीय विस्?तार देखें तो यह जानकर ताज्?जुब होना ही चाहिए कि जिस पूर्वोत्तर प्रदेशों के परिवार को पिछले 15 वर्ष से हर प्रधानमंत्री कोई न कोई पैकेज देता रहा है, उसी प्रदेश में गरीबी के पांव और गहरे जा धंसे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में निर्धन भारत के एक-तिहाई से अधिक लोग रहते हैं। नए राज्यों में उत्तराखंड को छोड़कर झारखंड और छत्तीसगढ़ की खबर अच्छी नहीं है। 

योजना आयोग में बैठे विशेषज्ञों के दल की यह सनद बस एक ही काम कर सकती है कि कई राज्?यों में गरीबी मिटाने के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों और केंद्र से जाने वाले अनुदान को तत्?काल बंद कर दिया जाए। महंगाई बढ़ाने के लिए 45 हजार करोड़ रुपए के नए टैक्?सों की योजना भी लागू की जानी है। इसके अलावा गरीबी के बारे में देश में एक धुंध फैलाई जाएगी। 

मैं समझता हूं यह पाखंड का व्याकरण है। इससे गरीब अपने को अपमानित और छला हुआ महसूस करेगा। अगर गरीब का गुस्?सा सीधे सरकार को निशाने में लेगा तो हमारे लिए यह शिकायत करने की गुंजाइश नहीं रह जाएगी कि वंचित भारत संविधान की कद्र क्?यों नहीं करता, चुनाव से पैदा सरकारों का अनुशासन क्?यों नहीं मानता, और सरकार पर भरोसा क्यों नहीं रखता?