Sunday, December 11, 2011

चाय की दुकान पर सेंसर कैसे लगाएंगे?

प्रवक्ता खुद की जबान नहीं बोलते। वे अपने स्वामी की आवाज होते हैं या फिर लंबे समय तक आवाज नहीं रह पाते। इसी तरह, मंत्री भी अपने मुखिया के अप्रत्यक्ष अनुमोदन के बगैर नाटकीय या प्रबल नीतिगत बदलाव का प्रस्ताव नहीं रखते। यही सामान्य रीति है। वर्तमान में इंटरनेट पर संवाद के सबसे असरदार तंत्र, सोशल मीडिया पर प्रस्तावित सेंसरशिप के लिए कपिल सिब्बल अकेले जिम्मेदार नहीं हैं। 

सेंसर आमतौर पर भ्रांतिग्रस्त सरकारों के लिए आखिरी प्रलोभन होता है, जो इस भ्रम के सहारे खुद को सांत्वना देना चाहती हैं कि उनकी गलतियां बेअसर और बेईमान शासन की बजाय बस मानहानि की कोशिशें हैं। बेशक, सेंसर के लिए बहाना हमेशा राष्ट्रहित ही होता है। आपातकाल के दौरान सरकार ने इन कानाफूसियों को हवा दी कि उसके सामने घुटने न टेकने वाले पत्रकारों को सीआईए ने खरीद लिया है। अब सोवियत संघ के साथ केजीबी भी दफ्न हो गई है और सीआईए कुछ-कुछ मित्रपक्ष जैसा हो गया है, ऐसी फुसलाहटें गई नहीं हैं। इन दिनों, जब आप पार्टी लीडरों की संतनुमा छवि ढहाने वाले कार्टूनों को मिटाना चाहते हैं, तो कारण बन जाती है सांप्रदायिकता। यह तनाव का माकूल पल है। भारतीय मीडिया शायद ही कभी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। जब यूरोप स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम के पैगंबर की अभद्र छवियां छापने में व्यस्त था, तब भारतीय मीडिया जानता था कि स्वतंत्रता, गैरजिम्मेदारी का बहाना नहीं है। 

दिल्ली के क्षणभंगुर शासक अगर अधिक बुद्धिमान नहीं, तो ज्यादा सयाने तो बन ही चुके हैं। वे सोचते हैं कि ‘सरोगेट सेंसरशिप’ के साथ एक बार में मीडिया की एक बांह मरोड़कर वे बच निकल सकते हैं- अक्सर सीधे कार्यकारी अधिकारी की बदौलत या अहंकार को बढ़ावा देने के ज्यादा स्वीकार्य समाधान या फिर बैंक बैलेंस में उदारता के जरिए। आलोचना को शांत करने के लिए व्यक्गित तौर पर पत्रकारों पर तहकीकात करने वाली संस्थाओं के माध्यम से दबाव डाला जाता है। मीडिया के मालिक अपनी गर्दन पर सत्ता-शक्ति का ठंडा हाथ महसूस करते हैं और कई बार पिछवाड़े पर चपत के रूप में ढके-छुपे ढंग से भी। यहां भरोसेमंद बने रहने के इनाम भी होते हैं, जो तुच्छ चीजों से लेकर भौतिक लाभों के रूप में मिलते हैं। हालांकि भुनाने के लिए जरूरी पुरस्कार पॉइंट बढ़ते ही जा रहे हैं। मीडिया मैनेजर और लिक्खाड़ यह जानते हैं। जो गर्मी में नहीं टिक पाते, वे रसोईघर से बाहर हो जाते हैं और सीधे चलकर राजनेताओं के ड्राइंगरूम के वातानुकूलित आराम में पहुंच जाते हैं। पत्रकार धर्म का निर्वाह करने वाले अन्य लोग असुविधा और कष्ट को लेकर न बखेड़ा खड़ा करते हैं न ही पलायन करते हैं। 

जब माहौल शांतिपूर्ण हो, तब भी मंत्री धौंस जमाने के आदी हो सकते हैं। और जब मौसम अशांत हो जाता है, तो वे युद्ध की मानसिकता में पहुंच जाते हैं। व्यापक तौर पर विदेशी भूमि पर लड़ा गया युद्ध हारने वाले एकमात्र अमेरिकी सेनापति विलियम वेस्टमोरलैंड ने यह सफाई देते हुए खुद को सांत्वना दी थी कि आधुनिक युग में वियतनाम युद्ध पहला युद्ध था, जो बगैर सेंसरशिप के लड़ा गया। उन्होंने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा कि ‘सेंसरशिप के बगैर चीजें जनता के दिमाग में भयंकर भ्रम पैदा कर सकती हैं।’ यही बात शक्तिसंपन्न लोगों को सबसे ज्यादा चिंतित करती है कि लोग सच के जरिए ‘भ्रमित’ किए जा सकते हैं। वे तमाम बहस, सवाल और तर्कसंगत जिम्मेदारियों को मिटा देना चाहते हैं, क्योंकि कुर्सी के लिए उनके लालच की कोई सीमा नहीं होती। वे दूरदर्शन और आकाशवाणी की तरह अपने नियंत्रण वाले मीडिया की साफ-सफाई और काट-छांट करते हैं और इस तरह उसकी साख को पुंसत्वहीन कर डालते हैं। इसके बाद कैंचियां उस मीडिया के लिए सामने आती हैं, जिसे वे नियंत्रित नहीं करते। 

यदि इंटरनेट पर सेंसरशिप सांकेतिक से ज्यादा कुछ नहीं होती (मसलन सर्वर बंद करना), तो ऐसा पहले से ही हो चुका होता। हालांकि, किसी लोकतांत्रिक सरकार के पास मुअम्मर गद्दाफी, हफीज असद या चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की ढकी-छुपी जबरदस्ती के जैसे निरंकुश अधिकार नहीं होते। कृत्रिम तर्क दिए ही गए होंगे। परंतु भारत सरकार को जल्दी ही पता चलेगा कि निजी संचार क्षेत्र के उसके कुछ सहयोगियों के मुकाबले इंटरनेट आसानी से नहीं झुकता। सोशल मीडिया का चमत्कार व्यक्तिगत आवाज और श्रोता जनसमूह के इसके अद्वितीय मेल में है। यह करोड़ों लोगों के बीच बातचीत है। आप चाय की दुकान पर सेंसर कैसे लगा सकते हैं। 1975 में श्रीमती इंदिरा गांधी विपक्ष को जेल में ठूंस सकीं और खाली जगह के जरिए मुखपृष्ठों पर छाप भी छोड़ सकीं, लेकिन वे चाय की हर दुकान पर ताला नहीं जड़ सकीं। सोशल मीडिया मानव इतिहास में चाय की सबसे बड़ी दुकान है। 

यहां पर महत्वपूर्ण प्रश्न बचा रह जाता है : सिब्बल तो प्रवक्ता हैं, मालिक कौन है? पता नहीं क्यों, पर डॉ. मनमोहन सिंह का नाम जवाब जैसा नहीं लगता। वे किसी इमोटीकॉन को नहीं पहचान पाएंगे। 

एक पैटर्न देखा जा सकता है। कांग्रेस अपनी सारी कोशिशें उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों पर केंद्रित कर रही है। कांग्रेस की किस्मत सुधारने के लिए गंभीर राजनीतिक निर्णय लिए जा रहे हैं। राहुल गांधी जानते हैं कि अन्ना हजारे के आंदोलन ने अपने सत्ता-विरोधी संदेश के प्रसार के लिए सोशल मीडिया का शानदार इस्तेमाल किया है। हजारे, प्रस्तावित लोकपाल कानून को कमजोर करने के लिए सार्वजनिक तौर पर राहुल गांधी को दोषी ठहरा चुके हैं। हजारे के मामले में सरकार कुछ नहीं कर सकती। क्या यह हजारे का संदेश ले जाने वाले इंटरनेट पर सेंसर लगाने की कोशिश कर रही है? 

यदि कपिल सिब्बल के विचार के पीछे यही तर्कसंगत वजह है, तो फिर यहां पर ब्रेकिंग न्यूज है। वास्तविकता में आइए। चाय की इस दुकान में कोई दीवार नहीं है। 

Thursday, December 8, 2011

संवेदना के पते पर आत्मीयता की पाती

नया बैंक खाता खुलवाने के लिए वोटर आईडी, मार्कशीट समेत अन्य दस्तावेज तलाश रहा था, तभी अचानक एक काफी पुराने कागज पर नजर पड़ी। गौर से देखा तो पाया करीब बीस बरस पुरानी एक चि_ी है, जो मौसी ने भेजी थी। पढ़ते-पढ़ते पुरानी यादों में खो गया। 

बात बाईस बरस पुरानी है। पिताजी नौकरी की तलाश में मंडीदीप चले आए थे। मम्मी और छोटा भाई भी उनके साथ ही आ गए थे। मैं दादा-दादी के साथ गांव में ही रह गया था। सालभर बाद मैं भी मंडीदीप आ गया। मेरी मौसी मुझे यहां लाई थीं। तब मैं चौथी क्लास में पढ़ता था। गांव से यहां आने के बाद दादाजी और अन्य रिश्तेदारों का हाल-चाल जानने, कुशलक्षेम पूछने का एक ही जरिया होता था - चि_ी। 

मोबाइल तो तब होते नहीं थे, टेलीफोन भी आम नहीं थे। मां बोलतीं और मैं बड़े ध्यान से चि_ी लिखता था, ताकि कोई गलती न हो जाए। चि_ी लिखने का एक खास तरीका होता था। जैसे सबसे पहले बड़ों को चरण स्पर्श, प्रणाम, फिर ‘आगे हाल मालूम होवै’ जैसे जुमलों से अपनी बात कहना, अपने हाल बताना, फिर उनके हाल जानना। अंत में छोटों को ढेर सारा प्यार लिखना होता था। चि_ी लिखने में भी कोई कम समय नहीं लगता था, पूरे दो घंटे चाहिए होते थे। लिखने के बाद लाल डिब्बे में डालने के साथ ही शुरू हो जाता था डाकिये का बेसब्री से इंतजार। खाकी वर्दी में सजा-धजा डाकिया, पोस्टमैन बाबू, डाक वाले भैया... जाने कितने नाम, पर काम सिर्फ एक पैगाम पहुंचाना, संदेश देना। घर के बाहर जब भी साइकिल की घंटी की ट्रिन-ट्रिन सुनाई दे या दरवाजे की कुंडी बजे, यही लगता कि चि_ी आ गई। सच पूछा जाए तो डाकिया बाबू के भी बड़े भाव हुआ करते थे, क्योंकि सुख-दुख की खबरों के खजाने की चाबी उसी के तो पास हुआ करती थी। जब कभी चीठी  आ जाए और डाकिया नाम लेकर कहे कि फलां बाबू, तुम्हारी चि_ी आई है तो हम मारे खुशी के आसमान सिर पर उठा लिया करते थे। एक खुशी चि_ी मिलने की और दूसरी डाकिया बाबू द्वारा नाम लेकर बुलाने की।चीठी को कमीज की जेब में रखकर हम कुछ इस तरह अकड़कर चलते मानो पूरे मोहल्ले में सिर्फ हमारी हीचीठी आई हो। घर जाकर बड़ी उत्सुकता से चि_ी खोलकर देखते कि किसने क्या लिखा है। सबसे पहले तो यही पढ़ते किचीठी में हमारे बारे में क्या लिखा गया है। जब भी कोई चीठी आती, उसे कई दिनों तक बड़ी हिफाजत से संभालकर रखते थे। 

यह सब सोच ही रहा था कि मम्मी ने आकर टोका : इस पुराने कागज को पढ़ते-पढ़ते कहां खो गए हो? मम्मी को बताया मौसी की पुरानी चि_ी है। पढ़कर लगता है समय कैसे तेजी से पंख लगाकर उड़ जाता है। कल तक जिस डाकिया बाबू की खूब पूछपरख और आवभगत हुआ करती थी, उसे आज कोई पूछने वाला भी नहीं बचा। कोई चि_ी भी नहीं लिखता। संचार क्रांति के साधनों ने चि_ी और डाकिये को गुजरे जमाने की चीज बना दिया। उन साधनों को प्रणाम, जिन्होंने दुनिया को समेटकर एक वैश्विक समुदाय बना दिया है, किंतु चि_ियों में जो निजता का संस्पर्श होता था, आत्मीयता की जो भीनी गंध होती थी, और जो एक विशिष्ट देशज स्थानिकता होती थी, उसकी तुलना इनसे नहीं की जा सकती। अतीत का एक मोह होता है और अतीत का रोमान भी होता है। यह ऐतिहासिक प्रक्रिया का अनिवार्य अंग है कि समय के साथ कुछ चीजें हाशिये पर चली जाती हैं और कुछ चीजें केंद्रीयता ग्रहण कर लेती हैं। लेकिन चि_ियों जैसी अब लगभग भूली-बिसरी हो चुकी चीजों को याद करने का एक अर्थ यह भी है कि हम अपने भीतर की संवेदनशीलता की नमी को जुगाए और बचाए रखें। चि_ियों की याद हमारी संवेदना के पते पर एक आत्मीय पाती है। 

कोलावेरी हिंसा का चढ़ता ग्राफ

यूट्यूब की कृपा से इन दिनों एक गाना तमाम लोगों, खासकर युवाओं की जुबां पर चढ़ा हुआ है, ‘व्हाय दिस कोलावेरी डी?’ सुनते हैं टूटी-फूटी तमिल मिश्रित अंग्रेजी का यह गाना प्यार में निराश शराब के नशे में बहकते आम युवा की पुकार है, जो प्रेमिका से पूछ रहा है : इतना गुस्सा क्यों? अभागा नशेड़ी प्रेमी रालेगणसिद्धी जाकर यह गाता तो शायद उसे खंभे से बांधकर पीटा जाता और हरियाणा में प्रेम का सरेआम इजहार उसे खाप पंचायतों के गुस्सैल मंच पर ला खड़ा करता, क्योंकि जहां तक गुस्से की बात है, वह भारत में रूठे प्रेमियों तक ही सीमित नहीं, तमाम आयु और आय वर्गों की नाक की नोंक पर भी रखा रहता है। मुद्दा कोई भी हो, तकरार हुई नहीं कि मारपीट शुरू हो जाती है। नाराज नागरिक नेताओं पर जूते-चप्पल फेंकने या थप्पड़ मारने पर उतारू दिखते हैं तो सड़कों पर हर कहीं से ‘रोड रेज’ की खबरें मिल रही हैं। खबरें ही नहीं, सरकारी आंकड़े भी बयां रहे हैं कि हर कहीं ‘कोलावेरी हिंसा’ का चढ़ता ग्राफ लोगों को हल्ला बोल मुद्रा में ला रहा है। निरीह औरतों, बच्चों तथा बूढ़ों के खिलाफ तो विशेष तौर से, जो पलटवार करने में असमर्थ हैं। 

नागरिकों के गुस्से पर ठंडे छींटे डालने और तटस्थता और शांति की अपील करने की उम्मीद हम किससे करें? पहले सहज जवाब होता था, गांधीवादियों या घट-घटव्यापी मीडिया से, पर इन दिनों गांधीवाद के उपासक भी नापसंद व्यवस्था के प्रतिनिधियों के खिलाफ गुस्से और मारपीट को सही ठहराने लगे हैं और मीडिया इन हिंसक छवियों और बयानों को दिनभर भुनाता हुआ हिंसा करने वालों को राज-समाज में एक तरह की सांस्कृतिक स्वीकृति और शोहरत दिला रहा है। लगता है यह लगभग मान लिया गया है कि आज जो कुछ व्यवस्था सम्मत है, वह कुचलने लायक है और उसके खिलाफ हिंसक तोडफ़ोड़ निंदनीय हरकत नहीं, जनता का लोकतांत्रिक हक और सराहनीय तेवर है। दरअसल अक्रोध और अहिंसा के विचार उतने इकहरे नहीं हैं, जितना गांधी के शब्दों को एक किस्म का धार्मिक दर्जा दे चुकेलोग मान बैठे हैं। उनका सतही गांधीवाद कुछ-कुछ परशुराम की धर्म की समझ सरीखा है, जिसके तहत पिता की आज्ञा होते ही बिना जवाबदेही का इंतजार किए फरसा उठाकर बेबुनियाद शक की शिकार मां का सिर काट लाना आदर्श वारिस होना है। 

एक वरिष्ठ और बीमार नेता पर हमले की खबर सुनकर भरी सभा में हमारे एक आदरणीय गांधीवादी की प्रतिक्रिया थी : सिर्फ एक ही थप्पड़? और अंधभक्त श्रोता ठठाकर हंस पड़े। क्या ऐसी गैरजिम्मेदाराना फब्ती कसने वाले सिंगुर के किसानों के खिलाफ मारपीट की पैरोकारी करने या बाबरी गिरने पर हर्ष जताने वालों से बहुत फर्क ठहरते हैं? इतिहास गवाह है कि अपने पक्ष को जिताने के लिए किसी भी ‘वाद’ की निजी व्याख्या करके (वह गांधीवाद हो, नक्सलवाद या माक्र्सवाद) उसे धर्म का दर्जा देकर फौरी जुनून पैदा कर देना बड़ा आसान है। लेकिन अंतत: यह खेल बहुत खतरनाक साबित होता है। नेता पर अंधभक्ति रखने वाले सामान्य बुद्धि के अनुयायियों के लिए कुछ विचार तो तर्क के परे एक अवध्य गाय बन जाते हैं और उनकी परिधि के बाहर का सबकुछ अपावन, क्षुद्र और ताडऩा का सहज अधिकारी है। इस तरह की इकहरी समझ और वैचारिक जिद ने ही महाभारत से लेकर कलिंग और बंगाल से लेकर भारत-पाक विभाजन तक उन भीषण गृहयुद्धों को पैदा किया है, जिन्होंने सभ्यता को शर्मसार किया है। उत्तेजना के क्षण बीतने पर उस पाशवी युद्ध का कोई गांधी या व्यास सरीखा द्रष्टा या युधिष्ठिर या अशोक सरीखा विजेता साफ कह उठता है कि ऐसी जीत अर्थहीन है और विनाशकारी युद्ध के पीछे सत्य-असत्य का टकराव नहीं, दो अहंवादी धड़ों की मान्यताओं की स्वार्थी टकराहट ही थी। अंत में जो हाथ लगा, वह है खंडहर, सर धुनते नागरिक और पछतावा। हर ईमानदार महानायक इसीलिए कथित विजय की घड़ी में खुशी मनाने के बजाय घोर आत्मघृणा में डूब जाता है। 

पूछा जा सकता है कि तब क्या वजह है कि औपचारिक इतिहास और नेता खमठोंक युद्ध छेडऩे वालों के नाम पर फूल फेंकने में इतनी रुचि लेते हैं? पहली वजह यह कि इतिहास लेखन अक्सर राजकीय रुचि से होता आया है और इसलिए वह युद्ध को जायज ठहराता है। दूसरे, लोगबाग अक्सर कटु सच्चाई की अपेक्षा मनोरंजक अर्धसत्य अधिक पसंद करते हैं, लिहाजा टीकाकार हों या मीडिया या पदलोलुप नेता, सभी अधिकतर नाटकीय उत्तेजना से भरपूर विवरणों को ही केंद्र में रखकर अपने भाषणों और ग्रंथों को लोकप्रिय बनाते हैं। सच्ची नैतिक दुविधा की बात करने वाले विदुर, गृहयुद्ध के विरोध में वन चले गए बलराम और सच्चे पछतावे से मथे जाने पर खुद को दोषी कहकर वैराग्य धारण करने वाले सत्यवादी युधिष्ठिर के बजाय आम लोग धनुर्धारी अर्जुन, उग्रतेजा कर्ण, गदाधारी भीम और जुझारू द्रोण के उग्र विद्रोह और गुस्से को अधिक सराहना भाव से याद रखते हैं। हमारे नेतागण कुछ देर को अपनी बात मनवाने और चुनावी आग्रहों से मुक्त होकर तटस्थता से महाभारत का अंत पढें़ तो शायद वह उनको कई बातें नई तरह से सोचने को विवश करे। 

युद्ध के बाद जीता हुआ राज्य त्यागकर पांडवों का वैराग्य धारण करना और मृत भाइयों का तर्पण करने के बाद हिमालय को प्रस्थान करना कोई यूनानी तर्ज की त्रासदी नहीं, वह अपनी अमर्यादित हिंसक कथनी और करनी पर शर्म और भाइयों के खून से भीगी धरती पर राज करने की गहरी अनिच्छा अनुभव करने की ईमानदार घड़ी है, जिससे गुजरना कालातीत मर्यादाओं का महत्व व क्रोध (अमर्ष भाव) की निस्सारता पहचानना है। वेदव्यास और कृष्ण शाश्वत मूल्यों को लेकर शांत प्रकृति युधिष्ठिर को सदैव उनके गुस्सैल भाइयों से ऊपर मानते हैं। इसीलिए यक्षप्रश्नों की झड़ी लगाकर धर्म युधिष्ठिर से जीवन का केंद्रीय सत्य कहलवाता है और उचितानुचित विचार कर तटस्थता से महाभारत को देखने-समझाने लायक प्रायदृष्टि का वर भी कृष्ण अपने परम सखा अर्जुन को नहीं, अक्रोधी युधिष्ठिर को ही देते हैं।

Sunday, November 27, 2011

पैरी हाई डेम के सर्वे से खलबली

 गरियाबंद के लोग भविष्य को लेकर चिंतित 
वर्षों बाद पैरी हाई डेम के सर्वे होने की खबर से लोगों में खलबली मच गई है। फिर से यहां की बसी बसाई दुनिया को उजाडऩे की योजना से क्षेत्र के लोगों में चिंता व्याप्त है। हमेशा हाई डेम की तलवार क्षेत्र में लटकती रहती है। सर्वे को लेकर क्षेत्र की जनता चिंतित है। अब तक विरोध के चलते डेम को लेकर शासन-प्रशासन ने इसे बनाने हिम्मत नहीं दिखाई है। यह तो तय है कि इस बार भी जबरदस्त विरोध होगा। क्योंकि आस पास के गांव जब डूब में आ जाएंगें तो गरियाबंद का अस्तित्व नहीं रहेगा। वैसे लोग अब अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। 

1 जनवरी 2012 को गरियाबंद जिला बन जाएगा, ऐसे में जिला मुख्यालय का स्थान डेम बनने की स्थिति में टापू से कम नहीं रहेगा। जिले के स्थाई दफ्तर मालगांव पहाड़ी को प्रशासन ने फाइनल कर दिया है। एक तरफ जिले की सौगात है तो दूसरी तरफ हाई डेम के सर्वे की चर्चा गांवों में शुरू हो गई है। तेजी से सर्वे होने का हल्ला शनिवार को नगर सहित गांवों में पहुंचा।ग्रामीणों का स्पष्ट मत है कि किसी भी शर्त में हाई डेम नहीं बनने देंगे। उल्लेखनीय है कि हाई डेम बनने का विरोध कई बार किया गया। शनिवार को नगर के युवकों के जत्थे ने सर्वे के विरोध में रैली निकाली व राज्यपाल के नाम ज्ञापन प्रशासन को सौंपा। इस मौके पर ओम राठौर, संदीप सरकार, केशु सिन्हा, सन्नी मेमन, ओमप्रकाश सिन्हा,भुवन बघेल, सोवल जानसन, गौरव कुटारे, यशपाल देवांगन, दीपक तिवारी, सहित अनेक लोग मौजूद थे। आंदोलन के लिए ग्रामीण लामबंद हो रहे है। वैसे संघर्ष समिति पूर्व से गठित है। बताया जाता है कि रविवार को इसको लेकर बैठक रखी गई है। इसके बाद खुलासा हो पाएगा कि विरोध की रणनीति क्या होगी। क्षेत्र के लोगों में जिला बनने की खुशी है वहीं हाई डेम बनने के सर्वे का मामला सामने आते ही नाराजगी देखी जा रही है। गौरतलब है कि पैरी हाई डेम ब्रिटिश काल 1932 की योजना है। विश्व बैंक की मदद से पैरी नदी में बारूका के पास प्रस्तावित किया गया था। 

हाई डेम के डूबान क्षेत्र: बारूका, मालगांव, बेहराबुड़ा, घुटकूनवापारा, पाथरमोहदा, सोहागपुर, कस, मजरकटा , भिलाई, सढ़ौली, खट्टी, आमदी, कुरूभांठा, चिखली,मुहेरा , क ोदोबतर, पटोरा, डुबान क्षेत्र चिह्नित किया गया है। 

आंशिक डूबान क्षेत्र: गरियाबंद ,भेजराडिही, कासरबाय, गजंईपुरी, कोचबॉय, कोकड़ी, पेंड्रा, जडज़ड़ा, झितरी डुमर, कोसमबुड़ा, तांवर बाहरा, मैनपुर, संबलपुर, खरहरी सरईभदर, भीरगुड़ी, आएंगे। 

सच्चाई जानने लोग पहुंचे: गरियाबंद से 14 किमी दूर राज्य मार्ग से एक किमी अंदर पैरी हाई डेम के प्रस्तावित स्थान को देखने शनिवार को ग्रामीण पहुंचे जहां पाया कि राज्यमार्ग से प्रस्तावित डेम स्थल तक मुरम से सड़क बना ली गई है। वहीं प्रस्तावित स्थल व सड़क में संकेत चिन्ह बनाए गए है। इससे लोगों को भरोसा हो गया है कि सर्वे डेम का शुरू होने वाला है। 

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति नहीं: पैरी हाई डैम के बनाने को लेकर दूसरे क्षेत्र के राजनैतिक नेताओं में खासी दिलचस्पी है। लगातार मांग करते है कि डेम बनना चाहिए। वर्षों से यह बात ही सामने आती है कि केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से लाखों पेड़ होने के कारण अनुमति के लिए भेजी जाती है। कई बार तो अनुमति नहीं मिली है इस ताजा सर्वे होने के बाद फिर से केंद्र सरकार को अनुमति के लिए भेजा जाना तय है। अब देखना है कि इस मामले क ो लेकर राजनीतिक नेताओं का रूख क्या है। क्योंकि केंद्र में कांग्रेस व राज्य में भाजपा की सरकार है। 

Thursday, November 24, 2011

प्रस्तावित गरियाबंद जिले की प्रशासनिक स्थायी, अस्थायी दफ्तर की कार्ययोजना तैयार

प्रस्तावित गरियाबंद जिले की प्रशासनिक तैयारी तेजी से शुरू हो गई है। गुरुवार को यहां के ओएसडी दिलीप वासनीकर ने दायित्व मिलने के बाद पहली बार दौरा किया और अस्थायी व स्थायी दफ्तर लगाने को लेकर जगह का अवलोकन किया। उन्होंने मालगांव पहाड़ी की ऊंचाई में पहुंच इस बात की तस्दीक की कि पहाड़ी की जमीन बेहद ठोस है। इसके अलावा कालेज, आईटीआई भवन, वन काष्टागार, पारागांव, कृषि प्रक्षेत्र कें द्र का निरीक्षण कर इस बात की तलाश की कि कहां दफ्तर खुलना चाहिए । उन्होंने संकेत दिए कि अस्थायी व स्थायी दफ्तर को लेकर कार्य योजना बन गई है । जिसकी प्रस्तावित कार्यों की समीक्षा 26 नवम्बर को होगी । इसी लिए दौरे में आए है । 

इस अवलोकन के बाद खुलासा नहीं किया कि संभावित दफ्तर की जगह कौन सी होगी । वैसे अस्थायी कलेक्टर्स लगाने कॉलेज भवन को उपयुक्त समझा गया है । यहां के नागरिकों ने राज्य सरकार द्वारा नियुक्त ओएसडी के दौरे को लेकर सक्रियता नहीं दिखाई। श्री वासनीकर ने अचानक दौरा किया और यहां जगह को लेकर संभावना तलाशते रहे। इसके पूर्व कलेक्टर डॉ. रोहित यादव ने दौरा कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजे जाने की खबर है । प्रशासनिक सूत्रों के हवाले से बताया जाता है कि मालगांव पहाड़ी को स्थाई जिला दफ्तर बनाने उपयुक्त जगह बताया गया है। इसको लेकर 26 नवम्बर को कमिश्नर रायपुर में बैठक लेंगे । मालगांव पहाड़ी में लगभग 120 एकड़ शासकीय भूमि है । एक माह के बाद एक जनवरी 2012 को गरियाबंद जिला अस्तित्व में आ जाएगा । राज्य शासन के निर्देश पर तैयारी को लेकर ओएसडी को नियुक्त किया गया है । श्री वासनीकर ने चर्चा में बताया कि जनता की सुविधा के लिए जिला बनाया जा रहा है । मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों कलेक्टरों की बैठक ली थी । जिसमें उन्होंने नए जिले के व्यवस्था को लेकर निर्देश जारी किए है जिसमें एक जनवरी के पूर्व दफ्तर की व्यवस्था व्यवस्थित करने कहा है । अफसरों के निवास का चयन भी जल्द कर लिया जाएगा । बताया कि अस्थाई व स्थाई जिले के दफ्तर को लेकर कार्य योजना बन गई है । जिसकी प्रस्तावित कार्यों की समीक्षा 26 नवम्बर को होगी । 

इसी लिए दौरे में आए है । उन्होंने कहा कि जिले के निर्माण से जनता की तकलीफ दूर होगी । स्वास्थ्य और शिक्षा की समस्या दूर करना प्रशासन की प्राथमिकता में शामिल है। उनके दौरे में अपर कलेक्टर जी.आर. चुरेंद्र, एसडीएम के आर ओगरे ,जलसंसाधन कार्यपालन यंत्री, दिनेश भगोरिया, एसडीओ आर सी मेश्राम, एस डीओपी ए.आर.बैरागी,एसडीओ पीडब्लुडी आर आर सूर्या,सीएमओ नगर पंचायत अश्वनी शर्मा ,तहसीलदार गायकवाड़ उपस्थित थे । 

Friday, November 18, 2011

जिला दफ्तर लगेगा कॉलेज में

प्रस्तावित गरियाबंद जिला के अस्थाई दफ्तर शासकीय वीर सुरेन्द्रसाय महाविद्यालय में लगाए जाने का निर्णय ले लिया गया है। स्थानीय प्रशासन के पास गुरुवार को इस आशय के आदेश पहुंच गए है। एसडीएम केआर ओगरे ने बताया कि कॉलेज में जिले का दफ्तर लगाने का फैसला हो चुका है। शासन ने इस आशय के आदेश जारी कर दिए है। बताया कि कॉलेज बालक हाई स्कूल में लगाया जाएगा। वहां दो शिफ्ट में हाईस्कूल व कॉलेज संचालित होगा।

उल्लेखनीय है कि जिला एक जनवरी 2012 को अस्तित्व में आ जाएगा। इसको लेकर राज्य शासन ने प्रशासनिक तैयारी शुरू कर दी है। गरियाबंद जिले के लिए ओ.एस.डी. दिलीप वासनीकर को दायित्व सौंपा गया है। बताया जाता है कि अस्थाई दफ्तर को लेकर इसी माह के भीतर प्रशासनिक तैयारी तेज होगी। सूत्रों के मुताबिक स्थाई दफ्तर को लेकर भी मालगांव पहाड़ी लगभग फाइनल हो गया है। राज्य शासन 9 जिले के सेटअप को लेकर गंभीर है। इसके पूर्व कलेक्टर रोहित यादव ने अस्थाई व स्थाई दफ्तर को लेकर यहां का दौरा किया था।

गरियाबंद में शासकीय भूमि उपलब्ध नहीं होने के कारण मालगांव पहाड़ी को स्थाई दफ्तर के लिए तलाश की थी। यहां लगभग 110 एकड़ शासकीय भूमि है। जहां जिले के सभी विभागों के दफ्तर लगाए जा सक ते है। गरियाबंद क्षेत्र की जनता की वर्षों पुरानी मांग जिला बनाने की पूर्ण हो गई है । पांच ब्लाक के छोटे जिले के निर्माण से क्षेत्र का तेजी से विकास होगा।