Friday, November 25, 2011
Thursday, November 24, 2011
प्रस्तावित गरियाबंद जिले की प्रशासनिक स्थायी, अस्थायी दफ्तर की कार्ययोजना तैयार
प्रस्तावित गरियाबंद जिले की प्रशासनिक तैयारी तेजी से शुरू हो गई है। गुरुवार को यहां के ओएसडी दिलीप वासनीकर ने दायित्व मिलने के बाद पहली बार दौरा किया और अस्थायी व स्थायी दफ्तर लगाने को लेकर जगह का अवलोकन किया। उन्होंने मालगांव पहाड़ी की ऊंचाई में पहुंच इस बात की तस्दीक की कि पहाड़ी की जमीन बेहद ठोस है। इसके अलावा कालेज, आईटीआई भवन, वन काष्टागार, पारागांव, कृषि प्रक्षेत्र कें द्र का निरीक्षण कर इस बात की तलाश की कि कहां दफ्तर खुलना चाहिए । उन्होंने संकेत दिए कि अस्थायी व स्थायी दफ्तर को लेकर कार्य योजना बन गई है । जिसकी प्रस्तावित कार्यों की समीक्षा 26 नवम्बर को होगी । इसी लिए दौरे में आए है ।
इस अवलोकन के बाद खुलासा नहीं किया कि संभावित दफ्तर की जगह कौन सी होगी । वैसे अस्थायी कलेक्टर्स लगाने कॉलेज भवन को उपयुक्त समझा गया है । यहां के नागरिकों ने राज्य सरकार द्वारा नियुक्त ओएसडी के दौरे को लेकर सक्रियता नहीं दिखाई। श्री वासनीकर ने अचानक दौरा किया और यहां जगह को लेकर संभावना तलाशते रहे। इसके पूर्व कलेक्टर डॉ. रोहित यादव ने दौरा कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजे जाने की खबर है । प्रशासनिक सूत्रों के हवाले से बताया जाता है कि मालगांव पहाड़ी को स्थाई जिला दफ्तर बनाने उपयुक्त जगह बताया गया है। इसको लेकर 26 नवम्बर को कमिश्नर रायपुर में बैठक लेंगे । मालगांव पहाड़ी में लगभग 120 एकड़ शासकीय भूमि है । एक माह के बाद एक जनवरी 2012 को गरियाबंद जिला अस्तित्व में आ जाएगा । राज्य शासन के निर्देश पर तैयारी को लेकर ओएसडी को नियुक्त किया गया है । श्री वासनीकर ने चर्चा में बताया कि जनता की सुविधा के लिए जिला बनाया जा रहा है । मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों कलेक्टरों की बैठक ली थी । जिसमें उन्होंने नए जिले के व्यवस्था को लेकर निर्देश जारी किए है जिसमें एक जनवरी के पूर्व दफ्तर की व्यवस्था व्यवस्थित करने कहा है । अफसरों के निवास का चयन भी जल्द कर लिया जाएगा । बताया कि अस्थाई व स्थाई जिले के दफ्तर को लेकर कार्य योजना बन गई है । जिसकी प्रस्तावित कार्यों की समीक्षा 26 नवम्बर को होगी ।
इसी लिए दौरे में आए है । उन्होंने कहा कि जिले के निर्माण से जनता की तकलीफ दूर होगी । स्वास्थ्य और शिक्षा की समस्या दूर करना प्रशासन की प्राथमिकता में शामिल है। उनके दौरे में अपर कलेक्टर जी.आर. चुरेंद्र, एसडीएम के आर ओगरे ,जलसंसाधन कार्यपालन यंत्री, दिनेश भगोरिया, एसडीओ आर सी मेश्राम, एस डीओपी ए.आर.बैरागी,एसडीओ पीडब्लुडी आर आर सूर्या,सीएमओ नगर पंचायत अश्वनी शर्मा ,तहसीलदार गायकवाड़ उपस्थित थे ।
इस अवलोकन के बाद खुलासा नहीं किया कि संभावित दफ्तर की जगह कौन सी होगी । वैसे अस्थायी कलेक्टर्स लगाने कॉलेज भवन को उपयुक्त समझा गया है । यहां के नागरिकों ने राज्य सरकार द्वारा नियुक्त ओएसडी के दौरे को लेकर सक्रियता नहीं दिखाई। श्री वासनीकर ने अचानक दौरा किया और यहां जगह को लेकर संभावना तलाशते रहे। इसके पूर्व कलेक्टर डॉ. रोहित यादव ने दौरा कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजे जाने की खबर है । प्रशासनिक सूत्रों के हवाले से बताया जाता है कि मालगांव पहाड़ी को स्थाई जिला दफ्तर बनाने उपयुक्त जगह बताया गया है। इसको लेकर 26 नवम्बर को कमिश्नर रायपुर में बैठक लेंगे । मालगांव पहाड़ी में लगभग 120 एकड़ शासकीय भूमि है । एक माह के बाद एक जनवरी 2012 को गरियाबंद जिला अस्तित्व में आ जाएगा । राज्य शासन के निर्देश पर तैयारी को लेकर ओएसडी को नियुक्त किया गया है । श्री वासनीकर ने चर्चा में बताया कि जनता की सुविधा के लिए जिला बनाया जा रहा है । मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों कलेक्टरों की बैठक ली थी । जिसमें उन्होंने नए जिले के व्यवस्था को लेकर निर्देश जारी किए है जिसमें एक जनवरी के पूर्व दफ्तर की व्यवस्था व्यवस्थित करने कहा है । अफसरों के निवास का चयन भी जल्द कर लिया जाएगा । बताया कि अस्थाई व स्थाई जिले के दफ्तर को लेकर कार्य योजना बन गई है । जिसकी प्रस्तावित कार्यों की समीक्षा 26 नवम्बर को होगी ।
इसी लिए दौरे में आए है । उन्होंने कहा कि जिले के निर्माण से जनता की तकलीफ दूर होगी । स्वास्थ्य और शिक्षा की समस्या दूर करना प्रशासन की प्राथमिकता में शामिल है। उनके दौरे में अपर कलेक्टर जी.आर. चुरेंद्र, एसडीएम के आर ओगरे ,जलसंसाधन कार्यपालन यंत्री, दिनेश भगोरिया, एसडीओ आर सी मेश्राम, एस डीओपी ए.आर.बैरागी,एसडीओ पीडब्लुडी आर आर सूर्या,सीएमओ नगर पंचायत अश्वनी शर्मा ,तहसीलदार गायकवाड़ उपस्थित थे ।
Friday, November 18, 2011
जिला दफ्तर लगेगा कॉलेज में
प्रस्तावित गरियाबंद जिला के अस्थाई दफ्तर शासकीय वीर सुरेन्द्रसाय महाविद्यालय में लगाए जाने का निर्णय ले लिया गया है। स्थानीय प्रशासन के पास गुरुवार को इस आशय के आदेश पहुंच गए है। एसडीएम केआर ओगरे ने बताया कि कॉलेज में जिले का दफ्तर लगाने का फैसला हो चुका है। शासन ने इस आशय के आदेश जारी कर दिए है। बताया कि कॉलेज बालक हाई स्कूल में लगाया जाएगा। वहां दो शिफ्ट में हाईस्कूल व कॉलेज संचालित होगा।
उल्लेखनीय है कि जिला एक जनवरी 2012 को अस्तित्व में आ जाएगा। इसको लेकर राज्य शासन ने प्रशासनिक तैयारी शुरू कर दी है। गरियाबंद जिले के लिए ओ.एस.डी. दिलीप वासनीकर को दायित्व सौंपा गया है। बताया जाता है कि अस्थाई दफ्तर को लेकर इसी माह के भीतर प्रशासनिक तैयारी तेज होगी। सूत्रों के मुताबिक स्थाई दफ्तर को लेकर भी मालगांव पहाड़ी लगभग फाइनल हो गया है। राज्य शासन 9 जिले के सेटअप को लेकर गंभीर है। इसके पूर्व कलेक्टर रोहित यादव ने अस्थाई व स्थाई दफ्तर को लेकर यहां का दौरा किया था।
गरियाबंद में शासकीय भूमि उपलब्ध नहीं होने के कारण मालगांव पहाड़ी को स्थाई दफ्तर के लिए तलाश की थी। यहां लगभग 110 एकड़ शासकीय भूमि है। जहां जिले के सभी विभागों के दफ्तर लगाए जा सक ते है। गरियाबंद क्षेत्र की जनता की वर्षों पुरानी मांग जिला बनाने की पूर्ण हो गई है । पांच ब्लाक के छोटे जिले के निर्माण से क्षेत्र का तेजी से विकास होगा।
उल्लेखनीय है कि जिला एक जनवरी 2012 को अस्तित्व में आ जाएगा। इसको लेकर राज्य शासन ने प्रशासनिक तैयारी शुरू कर दी है। गरियाबंद जिले के लिए ओ.एस.डी. दिलीप वासनीकर को दायित्व सौंपा गया है। बताया जाता है कि अस्थाई दफ्तर को लेकर इसी माह के भीतर प्रशासनिक तैयारी तेज होगी। सूत्रों के मुताबिक स्थाई दफ्तर को लेकर भी मालगांव पहाड़ी लगभग फाइनल हो गया है। राज्य शासन 9 जिले के सेटअप को लेकर गंभीर है। इसके पूर्व कलेक्टर रोहित यादव ने अस्थाई व स्थाई दफ्तर को लेकर यहां का दौरा किया था।
गरियाबंद में शासकीय भूमि उपलब्ध नहीं होने के कारण मालगांव पहाड़ी को स्थाई दफ्तर के लिए तलाश की थी। यहां लगभग 110 एकड़ शासकीय भूमि है। जहां जिले के सभी विभागों के दफ्तर लगाए जा सक ते है। गरियाबंद क्षेत्र की जनता की वर्षों पुरानी मांग जिला बनाने की पूर्ण हो गई है । पांच ब्लाक के छोटे जिले के निर्माण से क्षेत्र का तेजी से विकास होगा।
Monday, September 26, 2011
पंडित दीनदयाल उपाध्याय
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर, 1916 को ब्रज के पवित्र क्षेत्र मथुरा ज़िले के छोटे से गाँव नगला चंद्रभान में हुआ था। दीनदयाल जी का जीवनकाल 25 सितंबर, 1916 से 11 फ़रवरी 1968 तक रहा। पंडित दीनदयाल उपाध्याय 1953 से 1968 तक भारतीय जनसंघ के नेता रहे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक प्रखर विचारक, उत्कृष्ट संगठनकर्ता तथा एक ऐसे नेता थे जिन्होंने जीवनपर्यंन्त अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी व सत्यनिष्ठा को महत्त्व दिया। वे भारतीय जनता पार्टी के लिए वैचारिक मार्गदर्शन और नैतिक प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय मज़हब और संप्रदाय के आधार पर भारतीय संस्कृति का विभाजन करने वालों को देश के विभाजन का ज़िम्मेदार मानते थे। वह हिन्दू राष्ट्रवादी तो थे ही, इसके साथ ही साथ भारतीय राजनीति के पुरोधा भी थे। दीनदयाल की मान्यता थी कि हिन्दू कोई धर्म या संप्रदाय नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय संस्कृति हैं। दीनदयाल उपाध्याय की पुस्तक एकात्म मानववाद (इंटीगरल ह्यूमेनिज्म) है जिसमें साम्यवाद और पूंजीवाद, दोनों की समालोचना की गई है। एकात्म मानववाद में मानव जाति की मूलभूत आवश्यकताओं और स्रजित क़ानूनों के अनुरुप राजनीतिक कार्रवाई हेतु एक वैकल्पिक सन्दर्भ दिया गया है।[1]
3 वर्ष की मासूम उम्र में दीनदयाल पिता के प्यार से वंचित हो गये। पति की मृत्यु से माँ रामप्यारी को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा। वे अत्यधिक बीमार रहने लगीं। उन्हें क्षय रोग हो गया। 8 अगस्त सन 1924 को रामप्यारी बच्चों को अकेला छोड़ ईश्वर को प्यारी हो गयीं। 7 वर्ष की कोमल अवस्था में दीनदयाल माता-पिता के प्यार से वंचित हो गये। सन 1934 में बीमारी के कारण दीनदयाल के भाई का देहान्त हो गया।[2]
दीना को कोट गाँव जाना पड़ा। गंगापुर में आगे की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी। कोट गाँव में उसने पाँचवीं कक्षा में प्रवेश लिया। वहाँ भी वह पढ़ाई में प्रथम ही रहता था। राजघर जाकर आठवीं और नवीं कक्षा पास की। दीना के पास पढ़ने के लिए पुस्तकें नहीं थीं। दीनदयाल के मामा का लड़का भी उसके साथ पढ़ता था। जब दीनदयाल सो जाता या पढ़ाई नहीं करता था। तब दीना उसकी पुस्तकों से पढ़ लेता था। अब दीना नवीं कक्षा में था। दीनदयाल को फिर भारी दुःख का सामना करना पड़ा। उसका छोटा भाई शिबु भी टाइफाइड होने से चल बसा। दीना को गहरा दुःख हुआ। दोनों भाइयों में बहुत अधिक प्यार था। नवीं कक्षा पास करने के बाद दीना राजघर से सीकर गया। वहाँ भी उसने अपने अध्यापकों पर अपनी बुद्धि, लगन और परिश्रम की धाक जमा दी। सभी उसे बहुत प्यार करते थे। हाईस्कूल की परीक्षा से कुछ माह पूर्व दीना बीमार पड़ गया। हाईस्कूल की परीक्षा आरम्भ हो गई। दीना ने अच्छी तरह अपने प्रश्नपत्र किए। दीनदयाल न केवल परीक्षा में प्रथम आया बल्कि कई विषयों में एक नया रिकार्ड भी बनाया। उसकी रेखागणित की उत्तर-पुस्तिका कितने ही वर्षों तक नमूने के रूप में रखी गई।
यहाँ दीनदयाल में राष्ट्र की सेवा के बीज का स्फुरण हुआ। बलवंत महासिंघे के सम्पर्क के कारण दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों में रुचि लेने लगे। इन सब व्यस्तताओं के बाद भी उन्होंने सन 1939 में प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा पास की। पंडित जी एम.ए. करने के लिए आगरा चले गये। वे यहाँ पर श्री नानाजी देशमुख और श्री भाऊ जुगाडे के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे। इसी बीच दीनदयाल जी की चचेरी बहन रमा देवी बीमार पड़ गयीं और वे इलाज कराने के लिए आगरा चली गयीं, जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी। दीनदयालजी इस घटना से बहुत उदास रहने लगे और एम.ए. की परीक्षा नहीं दे सके। सीकर के महाराजा और श्री बिड़ला से मिलने वाली छात्रवृत्ति बन्द कर दी गई।[3]
जीवन परिचय
दीनदयाल के पिता का नाम 'भगवती प्रसाद उपाध्याय' था। इनकी माता का नाम 'रामप्यारी' था जो धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। रेल की नौकरी होने के कारण उनके पिता का अधिक समय बाहर बीतता था। उनके पिता कभी-कभी छुट्टी मिलने पर ही घर आते थे। थोड़े समय बाद ही दीनदयाल के भाई ने जन्म लिया जिसका नाम शिवदयाल रखा गया। पिता भगवती प्रसाद ने अपनी पत्नी व बच्चों को मायके भेज दिया। उस समय दीनदयाल नाके ना चुन्नीलाल शुक्ल धनकिया में स्टेशन मास्टर थे। मामा का परिवार बहुत बड़ा था। दीनदयाल अपने ममेरे भाइयों के साथ खाते-खेलते बड़े हुए। वे दोनों ही रामप्यारी और दोनों बच्चों का ख़ास ध्यान रखते थे।3 वर्ष की मासूम उम्र में दीनदयाल पिता के प्यार से वंचित हो गये। पति की मृत्यु से माँ रामप्यारी को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा। वे अत्यधिक बीमार रहने लगीं। उन्हें क्षय रोग हो गया। 8 अगस्त सन 1924 को रामप्यारी बच्चों को अकेला छोड़ ईश्वर को प्यारी हो गयीं। 7 वर्ष की कोमल अवस्था में दीनदयाल माता-पिता के प्यार से वंचित हो गये। सन 1934 में बीमारी के कारण दीनदयाल के भाई का देहान्त हो गया।[2]
शिक्षा
गंगापुर में दीनदयाल के मामा राधारमण रहते थे। उनका परिवार उनके साथ ही था। गाँव में पढ़ाई का अच्छा प्रबन्ध नहीं था, इसलिए नाना चुन्नीलाल ने दीनदयाल और शिबु को पढ़ाई के लिए मामा के पास गंगापुर भेज दिया। गंगापुर में दीना की प्राथमिक शिक्षा का शुभारम्भ हुआ। मामा राधारमण की भी आय कम और खर्चा अधिक था। उनके अपने बच्चों का खर्च और साथ में दीना और शिबु का रहन-सहन और पढ़ाई का खर्च करनी पड़ती थी।शिक्षा में कठिनाई
सन 1926 के सितम्बर माह में नाना चुन्नीलाल के स्वर्गवास की दुखद सूचना मिली। दीना के मन पर गहरी चोट लगी। इस दुख से उभर भी नहीं पाए थे कि मामा राधारमण बीमार पड़ गए। वैद्यों ने बताया कि उन्हें टी.बी. की बीमारी हो गई है। उनका बचना कठिन है। वैद्यो ने औषधि देने से मना कर दिया। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए, यही समस्या थी। लखनऊ में उनके एक सम्बन्धी रहते थे। उनके पास से राधारमण का बुलावा आया। लखनऊ में इलाज की अच्छी व्यवस्था थी। किन्तु उन्हें वहाँ कौन ले जाए, यही समस्या थी। कहीं यह छूत की बीमारी किसी और को न लग जाए, इसी से सब उनके पास जाने से भी डरते थे। दीना बराबर मामा की सेवा में लगा रहता था। मामा के मना करने पर भी वह नहीं मानता था। मामा का लड़का बनवारीलाल भी दीना के साथ पढ़ता था, किन्तु अपने पिता के पास जाने में वह भी छूत की बीमारी से डरता था। दीना की आयु इस समय ग्यारह-बारह वर्ष की थी। वह अपने मामा को लखनऊ ले जाने के लिए तैयार हुआ। मामा ने बहुत मना किया। दीना नहीं माना। अन्त में मामा को दीना की बात माननी ही पड़ी। लखनऊ में मामा का उपचार आरम्भ हुआ। दीना ने डटकर मामा की सेवा की। उसकी परीक्षा भी पास आ रही थी। किन्तु उसे मामा की सेवा के अलावा और कोई ध्यान नहीं था। परीक्षा का ध्यान आते ही मामा ने दीना को गंगापुर भेज दिया। दीना पढ़ भी नहीं सका था। किन्तु होनहार बिरवान के होत चीकने पात वाली कहावत को उसने चरितार्थ कर दिया। दीना ने परीक्षा में सर्वोच्च अंक पाकर प्रथम स्थान प्राप्त किया। यह सभी के लिए आश्चर्य और प्रसन्नता की बात थी।दीना को कोट गाँव जाना पड़ा। गंगापुर में आगे की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी। कोट गाँव में उसने पाँचवीं कक्षा में प्रवेश लिया। वहाँ भी वह पढ़ाई में प्रथम ही रहता था। राजघर जाकर आठवीं और नवीं कक्षा पास की। दीना के पास पढ़ने के लिए पुस्तकें नहीं थीं। दीनदयाल के मामा का लड़का भी उसके साथ पढ़ता था। जब दीनदयाल सो जाता या पढ़ाई नहीं करता था। तब दीना उसकी पुस्तकों से पढ़ लेता था। अब दीना नवीं कक्षा में था। दीनदयाल को फिर भारी दुःख का सामना करना पड़ा। उसका छोटा भाई शिबु भी टाइफाइड होने से चल बसा। दीना को गहरा दुःख हुआ। दोनों भाइयों में बहुत अधिक प्यार था। नवीं कक्षा पास करने के बाद दीना राजघर से सीकर गया। वहाँ भी उसने अपने अध्यापकों पर अपनी बुद्धि, लगन और परिश्रम की धाक जमा दी। सभी उसे बहुत प्यार करते थे। हाईस्कूल की परीक्षा से कुछ माह पूर्व दीना बीमार पड़ गया। हाईस्कूल की परीक्षा आरम्भ हो गई। दीना ने अच्छी तरह अपने प्रश्नपत्र किए। दीनदयाल न केवल परीक्षा में प्रथम आया बल्कि कई विषयों में एक नया रिकार्ड भी बनाया। उसकी रेखागणित की उत्तर-पुस्तिका कितने ही वर्षों तक नमूने के रूप में रखी गई।
पढ़ाई में प्रशंसा
दीनदयाल जी का प्रिय विषय गणित था। वह गणित में हमेशा अव्वल अंक प्राप्त करते थे। सीकर के महाराज को इस मेधावी छात्र के विषय में खबर मिली। उन्होंने एक दिन दीना को बुलाया। उन्होंने कहा, ‘'बेटा, तुमने बहुत ही अच्छे अंक प्राप्त किए हैं। बताओ, तुम्हें पारितोषिक के रूप में क्या चाहिए?' दीना ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया, 'केवल आपका आशीर्वाद।' महाराज उस उत्तर से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने दीना को एक स्वर्ण पदक, पुस्तकों के लिए 250 रुपये और 10 रुपये प्रतिमाह विद्यार्थी-वेतन देकर आशीर्वाद दिया। इसके बाद दीनदयाल जी कॉलेज में पढ़ने के लिए पिलानी चले गए। वहाँ भी सभी अध्यापक उनके विनम्र स्वभाव, लगन और प्रखर बुद्धि से बड़े प्रभावित थे। पढ़ाई में पिछड़े छात्र दीनदयाल से पढ़ते थे और मार्गदर्शन पाते थे। दीनदयाल जी इन सबको बड़े प्यार से पढ़ाते और समझाते थे। ऐसे कई छात्र हर समय उन्हीं के पास बैठे रहते थे।स्वर्ण पदक
सन 1937, इण्टरमीडिएट की परीक्षा दी । इस परीक्षा में भी दीनदयाल जी ने सर्वाधिक अंक प्राप्त कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। बिड़ला कॉलेज में इससे पूर्व किसी भी छात्र के इतने अंक नहीं आए थे। जब इस बात की सूचना घनश्याम दास बिड़ला तक पहुँची तो वे बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने दीनदयाल जी को एक स्वर्ण पदक प्रदान किया। उन्होंने दीनदयाल जी को अपनी संस्था में एक नौकरी देने की बात कही। दीनदयाल जी ने विनम्रता के साथ धन्यवाद देते हुए आगे पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। बिड़ला जी इस उत्तर से बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, 'आगे पढ़ना चाहते हो, बड़ी अच्छी बात है। हमारे यहाँ तुम्हारे लिए एक नौकरी हमेशा ख़ाली रहेगी। जब चाहो आ सकते हो।' धन्यवाद देकर दीनदयाल जी चले गए। बिड़ला जी ने उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की।कॉलेज में प्रवेश
दीनदयाल जी को बी.ए. करना था। इसके लिए एस.डी. कॉलेज, कानपुर में प्रवेश लिया। मन लगाकर अध्ययन किया। छात्रावास में रहते थे। वहाँ उनका सम्पर्क श्री सुन्दरसिंह भण्डारी, बलवंत महासिंघे जैसे कई लोगों से हुआ। राजनीतिक चर्चाएँ काफ़ी-काफ़ी देर तक चलती थीं।- पं. दीनदयाल उपाध्याय |
यहाँ दीनदयाल में राष्ट्र की सेवा के बीज का स्फुरण हुआ। बलवंत महासिंघे के सम्पर्क के कारण दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों में रुचि लेने लगे। इन सब व्यस्तताओं के बाद भी उन्होंने सन 1939 में प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा पास की। पंडित जी एम.ए. करने के लिए आगरा चले गये। वे यहाँ पर श्री नानाजी देशमुख और श्री भाऊ जुगाडे के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे। इसी बीच दीनदयाल जी की चचेरी बहन रमा देवी बीमार पड़ गयीं और वे इलाज कराने के लिए आगरा चली गयीं, जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी। दीनदयालजी इस घटना से बहुत उदास रहने लगे और एम.ए. की परीक्षा नहीं दे सके। सीकर के महाराजा और श्री बिड़ला से मिलने वाली छात्रवृत्ति बन्द कर दी गई।[3]
राष्ट्र धर्म प्रकाशन
दीनदयाल ने लखनऊ में राष्ट्र धर्म प्रकाशन नामक प्रकाशन संस्थान की स्थापना की और अपने विचारों को प्रस्तुत करने के लिए एक मासिक पत्रिका राष्ट्र धर्म शुरू की। बाद में उन्होंने 'पांचजन्य' (साप्ताहिक) तथा 'स्वदेश' (दैनिक) की शुरुआत की। सन 1950 में केन्द्र में पूर्व मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू - लियाकत समझौते का विरोध किया और मंत्रिमंड़ल के अपने पद से त्यागपत्र दे दिया तथा लोकतांत्रिक ताकतों का एक साझा मंच बनाने के लिए वे विरोधी पक्ष में शामिल हो गए। डॉ. मुकर्जी ने राजनीतिक स्तर पर कार्य को आगे बढ़ाने के लिए निष्ठावान युवाओ को संगठित करने में श्री गुरु जी से मदद मांगी।राजनीतिक सम्मेलन
पंडित दीनदयाल जी ने 21 सितम्बर, 1951 को उत्तर प्रदेश का एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया और नई पार्टी की राज्य इकाई, भारतीय जनसंघ की नींव डाली। पंडित दीनदयाल जी इसके पीछे की सक्रिय शक्ति थे और डॉ. मुखर्जी ने 21 अक्तूबर, 1951 को आयोजित पहले 'अखिल भारतीय सम्मेलन' की अध्यक्षता की। पंडित दीनदयाल जी की संगठनात्मक कुशलता बेजोड़ थी।संघर्ष
पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपनी चाची के कहने पर धोती तथा कुर्ते में और अपने सिर पर टोपी लगाकर सरकार द्वारा संचालित प्रतियोगी परीक्षा दी जबकि दूसरे उम्मीदवार पश्चिमी सूट पहने हुए थे। उम्मीदवारों ने मज़ाक में उन्हें 'पंडितजी' कहकर पुकारा - यह एक उपनाम था जिसे लाखों लोग बाद के वर्षों में उनके लिए सम्मान और प्यार से इस्तेमाल किया करते थे। इस परीक्षा में वे चयनित उम्मीदवारों में सबसे ऊपर रहे। वे अपने चाचा की अनुमति लेकर 'बेसिक ट्रेनिंग' (बी.टी.) करने के लिए प्रयाग चले गए और प्रयाग में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में भाग लेना जारी रखा। बेसिक ट्रेनिंग (बी.टी.) पूरी करने के बाद वे पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों में जुट गए और प्रचारक के रूप में ज़िला लखीमपुर (उत्तर प्रदेश) चले गए। सन 1955 में दीनदयाल उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांतीय प्रचारक बन गए।सर्वोच्च अध्यक्ष
पंडित दीनदयाल जी की संगठनात्मक कुशलता बेजोड़ थी। आख़िर में जनसंघ के इतिहास में चिरस्मरणीय दिन आ गया जब पार्टी के इस अत्यधिक सरल तथा विनीत नेता को सन 1968 में पार्टी के सर्वोच्च अध्यक्ष पद पर बिठाया गया। दीनदयाल जी इस महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी को संभालने के पश्चात जनसंघ का संदेश लेकर दक्षिण भारत गए। पंडित जी घर गृहस्थी की तुलना में देश की सेवा को अधिक श्रेष्ठ मानते थे। पंडित जी ने अपने जीवन के एक-एक क्षण को पूरी रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक गहराई से जिया है। पत्रकारिता जीवन के दौरान उनके लिखे शब्द आज भी उपयोगी हैं। प्रारम्भ में समसामयिक विषयों पर वह ’पॉलिटिकल डायरी‘ नामक स्तम्भ लिखा करते थे। पंडित जी ने राजनीतिक लेखन को भी दीर्घकालिक विषयों से जोडकर रचना कार्य को सदा के लिए उपयोगी बनाया है।देश सेवा
पंडित जी घर गृहस्थी की तुलना में देश की सेवा को अधिक श्रेष्ठ मानते थे। दीनदयाल देश सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उन्होंने कहा था कि 'हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारतमाता है, केवल भारत ही नहीं। माता शब्द हटा दीजिए तो भारत केवल ज़मीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जाएगा। पंडित जी ने अपने जीवन के एक-एक क्षण को पूरी रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक गहराई से जिया है। पत्रकारिता जीवन के दौरान उनके लिखे शब्द आज भी उपयोगी हैं। प्रारम्भ में समसामयिक विषयों पर वह 'पॉलिटिकल डायरी‘ नामक स्तम्भ लिखा करते थे। पंडित जी ने राजनीतिक लेखन को भी दीर्घकालिक विषयों से जोडकर रचना कार्य को सदा के लिए उपयोगी बनाया है।लेखन
पंडित जी ने बहुत कुछ लिखा है। जिनमें एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ का सिद्धांत और नीति, जीवन का ध्येय राष्ट्र जीवन की समस्यायें, राष्ट्रीय अनुभूति, कश्मीर, अखंड भारत, भारतीय राष्ट्रधारा का पुनः प्रवाह, भारतीय संविधान, इनको भी आज़ादी चाहिए, अमेरिकी अनाज, भारतीय अर्थनीति, विकास की एक दिशा, बेकारी समस्या और हल, टैक्स या लूट, विश्वासघात, द ट्रू प्लान्स, डिवैलुएशन ए, ग्रेटकाल आदि हैं। उनके लेखन का केवल एक ही लक्ष्य था भारत की विश्व पटल पर लगातार पुर्नप्रतिष्ठा और विश्व विजय।[4]मृत्यु
विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों के स्वामी, पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की हत्या सिर्फ़ 52 वर्ष की आयु में 11 फ़रवरी 1968 को मुग़लसराय के पास रेलगाड़ी में यात्रा करते समय हुई थी। उनका पार्थिव शरीर मुग़लसराय स्टेशन के वार्ड में पडा पाया गया। भारतीय राजनीतिक क्षितीज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में सभ्यतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिया।Sunday, August 28, 2011
लोकतंत्र के हृदय में
हमारे लोकतंत्र के हृदय में एक कैंसर घर कर गया है : हमारी निर्वाचन प्रणाली वैध कोषों की बजाय काले धन से चलती है। नेताओं के तहत आने वाले संस्थान यह जानते हैं और अपनी व्यवस्थाएं जमा लेते हैं। सीबीआई जब अपनी पसंद के मौसमी लक्ष्य तक पहुंचना चाहती है, तो बहुत उग्र और कठोर हो सकती है, लेकिन इसे दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में प्रत्येक झोपड़ी से हर महीने डेढ़ सौ रुपए वसूलने वाले अपने उन साथी पुलिसियों पर लगाम कसने में कोई दिलचस्पी नहीं, जो यह पक्का करने के पैसे लेते हैं कि जलआपूर्ति में बाधा नहीं आएगी। गरीबों को माफ नहीं किया जाता, क्योंकि जाहिर है, वे अािर्थक तौर पर विपन्न हैं। आप जिधर भी निगाह डालें, नकद लेन-देन के बोटोक्स इंजेक्शन के कारण प्रशासन फूला हुआ नजर आएगा।
अकेला शख्स जो भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता है, अन्ना हजारे हैं। जैसा कि उन्होंने एक बार बड़े चटखारेदार अंदाज में इंगित किया था कि वे तो चुनाव लडऩे का खर्च ही नहीं उठा सकते।
यह बहस संकट की जड़, यानी चुनावी भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित किए बगैर समाधान सुझाने वाले अनगिनत प्रस्तावों के बीच डगमगा रही है। राजनीतिक जमात कारोबारियों, जजों, नौकरशाहों (जिला स्तर से नीचे) समेत उन तमाम लोगों के भ्रष्टाचार की जांच के लिए जुट गई है, जिनके बारे में आप सोच सकते हैं। लेकिन जब स्वयं के अवलोकन की बात आती है, तो इकट्ठा हुई जमात छितराने लगती है। निस्संदेह, यह ऐसे लोकपाल पर विमर्श नहीं करेगी, जिसके पास राजनीति में धन के प्रवाह की पड़ताल करने की ताकत हो।
बहाने तो यहां हमेशा मौजूद रहते हैं, विशेषकर निर्वाचन आयोग, जो कथित तौर पर सत्यनिष्ठा का संरक्षक है। यह उसी तरह है, जैसे कहा जाता है कि न्यायपालिका का अस्तित्व है। पुलिस और जज अपराध रोकने के लिए बनाए गए थे। अगर उन्होंने ऐसा किया होता, तो आज कोई बहस ही नहीं होती। निर्वाचन आयोग अपने इरादों में पूरी पारदर्शिता से गंभीर है, लेकिन चुनौतियां इसे अधिकार में मिली क्षमताओं से कहीं बढ़कर हैं। अगर आप इस बारे में हल्का सा अंदाजा ही चाहते हैं कि राजनीति में किस स्तर तक धन व्याप्त है, तो नेताओं के प्रकाशित बयानों को ही पढ़ लीजिए। आंध्रप्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष ने दावा किया है कि जगन रेड्डी से जुडऩे के लिए जिन विधायकों ने उनकी पार्टी छोड़ी, उनमें से हर को नकद 10 करोड़ रु. दिए गए हैं। इसे तथ्य की तरह मत देखिए। यदि नकदी ही वफादारी की अकेली गारंटी होती, तो कांग्रेस में इतनी क्षमता है कि हर विपक्षी पार्टी को खरीद ले। हां, यह दावा दर्शाता है कि किस श्रेणी की पेशकाश होती हैं।
मुझे उम्मीद है, किसी को भी इस बात पर भरोसा नहीं होगा कि चुनावी भ्रष्टाचार का उपचार राज्य द्वारा इसके लिए कोष बनाए जाने में निहित है। यह तो करदाताओं के धन को कभी तृप्त न होने वाले कुंड में भरते जाना होगा। यह बजटों को बढ़ाएगा, न कि उन्हें कम करेगा।
अन्ना हजारे के संकल्प और साहस ने कांग्रेस को अशक्त तो किया है, लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन अस्थिर नहीं हुआ है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम के नेतृत्व में कांग्रेस के जवाबी हमले के तहत अन्ना को तिहाड़ जेल पहुंचा दिया गया, तब पता चला कि उसके ‘पीडि़त’ को लोहे को भी सोने में बदल देने वाली कीमियागरी आती है। कांग्रेसी व्याकुलता इस बात से मापी जा सकती है कि ताजा बहस में सबसे तेज शोर चिदंबरम की मौन ध्वनि का है। कांग्रेस को यह समझ पाने में हैरानी भरे कुछ पल लगे कि इस आंदोलन की पहुंच सतह पर हो रही ट्विटरी गतिविधियों से कहीं ज्यादा गहरी है। गरीब जानते हंै कि अन्ना हजारे उनमें से ही एक हैं, हालांकि उनके सहयोगी ऐसे हो भी सकते हैं और नहीं भी। उन्हें इस बात से लेना-देना नहीं कि उनके सलाहकार कौन हैं। वे उनके पीछे जुट चुके हैं और यही उनके लिए पर्याप्त है। अन्ना की निजी साख पर बट्टा लगाने की कोशिश के चलते कांग्रेस ने ज्यादा सहानुभूति खोई। परंतु, विसंगति है कि यह मतदाताओं पर अन्ना-असर का ही डर है, जो सत्तारूढ़ गठबंधन की सलामती सुनिश्चित कर रहा है। अत:, अन्ना सरकार को हिला भी रहे हैं और उसकी निरंतरता भी पक्की कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री को एक अलग सवाल का जवाब जरूर देना चाहिए : सरकार चलाने की क्षमता के बगैर वे कितने लंबे समय तक पद पर बने रह सकते हैं? वे अपना आखिरी चुनाव लड़ चुके हैं। वे चुनावी मजबूरियों और समझौतों से मुक्त हैं। यह अमेरिकी राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल की तरह है, जहां उसे पार्टी को तो दिमाग में रखना पड़ता है, लेकिन ज्यादा बड़े सम्मोहन, यानी पुन: चुनाव लडऩे की जरूरत जैसी कोई बात नहीं होती। इस सुअवसर का ज्यादातर हिस्सा खो दिया गया है। क्या बाकी बचा हिस्सा भी गंवा दिया जाएगा?
अकेला शख्स जो भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता है, अन्ना हजारे हैं। जैसा कि उन्होंने एक बार बड़े चटखारेदार अंदाज में इंगित किया था कि वे तो चुनाव लडऩे का खर्च ही नहीं उठा सकते।
यह बहस संकट की जड़, यानी चुनावी भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित किए बगैर समाधान सुझाने वाले अनगिनत प्रस्तावों के बीच डगमगा रही है। राजनीतिक जमात कारोबारियों, जजों, नौकरशाहों (जिला स्तर से नीचे) समेत उन तमाम लोगों के भ्रष्टाचार की जांच के लिए जुट गई है, जिनके बारे में आप सोच सकते हैं। लेकिन जब स्वयं के अवलोकन की बात आती है, तो इकट्ठा हुई जमात छितराने लगती है। निस्संदेह, यह ऐसे लोकपाल पर विमर्श नहीं करेगी, जिसके पास राजनीति में धन के प्रवाह की पड़ताल करने की ताकत हो।
बहाने तो यहां हमेशा मौजूद रहते हैं, विशेषकर निर्वाचन आयोग, जो कथित तौर पर सत्यनिष्ठा का संरक्षक है। यह उसी तरह है, जैसे कहा जाता है कि न्यायपालिका का अस्तित्व है। पुलिस और जज अपराध रोकने के लिए बनाए गए थे। अगर उन्होंने ऐसा किया होता, तो आज कोई बहस ही नहीं होती। निर्वाचन आयोग अपने इरादों में पूरी पारदर्शिता से गंभीर है, लेकिन चुनौतियां इसे अधिकार में मिली क्षमताओं से कहीं बढ़कर हैं। अगर आप इस बारे में हल्का सा अंदाजा ही चाहते हैं कि राजनीति में किस स्तर तक धन व्याप्त है, तो नेताओं के प्रकाशित बयानों को ही पढ़ लीजिए। आंध्रप्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष ने दावा किया है कि जगन रेड्डी से जुडऩे के लिए जिन विधायकों ने उनकी पार्टी छोड़ी, उनमें से हर को नकद 10 करोड़ रु. दिए गए हैं। इसे तथ्य की तरह मत देखिए। यदि नकदी ही वफादारी की अकेली गारंटी होती, तो कांग्रेस में इतनी क्षमता है कि हर विपक्षी पार्टी को खरीद ले। हां, यह दावा दर्शाता है कि किस श्रेणी की पेशकाश होती हैं।
मुझे उम्मीद है, किसी को भी इस बात पर भरोसा नहीं होगा कि चुनावी भ्रष्टाचार का उपचार राज्य द्वारा इसके लिए कोष बनाए जाने में निहित है। यह तो करदाताओं के धन को कभी तृप्त न होने वाले कुंड में भरते जाना होगा। यह बजटों को बढ़ाएगा, न कि उन्हें कम करेगा।
अन्ना हजारे के संकल्प और साहस ने कांग्रेस को अशक्त तो किया है, लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन अस्थिर नहीं हुआ है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम के नेतृत्व में कांग्रेस के जवाबी हमले के तहत अन्ना को तिहाड़ जेल पहुंचा दिया गया, तब पता चला कि उसके ‘पीडि़त’ को लोहे को भी सोने में बदल देने वाली कीमियागरी आती है। कांग्रेसी व्याकुलता इस बात से मापी जा सकती है कि ताजा बहस में सबसे तेज शोर चिदंबरम की मौन ध्वनि का है। कांग्रेस को यह समझ पाने में हैरानी भरे कुछ पल लगे कि इस आंदोलन की पहुंच सतह पर हो रही ट्विटरी गतिविधियों से कहीं ज्यादा गहरी है। गरीब जानते हंै कि अन्ना हजारे उनमें से ही एक हैं, हालांकि उनके सहयोगी ऐसे हो भी सकते हैं और नहीं भी। उन्हें इस बात से लेना-देना नहीं कि उनके सलाहकार कौन हैं। वे उनके पीछे जुट चुके हैं और यही उनके लिए पर्याप्त है। अन्ना की निजी साख पर बट्टा लगाने की कोशिश के चलते कांग्रेस ने ज्यादा सहानुभूति खोई। परंतु, विसंगति है कि यह मतदाताओं पर अन्ना-असर का ही डर है, जो सत्तारूढ़ गठबंधन की सलामती सुनिश्चित कर रहा है। अत:, अन्ना सरकार को हिला भी रहे हैं और उसकी निरंतरता भी पक्की कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री को एक अलग सवाल का जवाब जरूर देना चाहिए : सरकार चलाने की क्षमता के बगैर वे कितने लंबे समय तक पद पर बने रह सकते हैं? वे अपना आखिरी चुनाव लड़ चुके हैं। वे चुनावी मजबूरियों और समझौतों से मुक्त हैं। यह अमेरिकी राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल की तरह है, जहां उसे पार्टी को तो दिमाग में रखना पड़ता है, लेकिन ज्यादा बड़े सम्मोहन, यानी पुन: चुनाव लडऩे की जरूरत जैसी कोई बात नहीं होती। इस सुअवसर का ज्यादातर हिस्सा खो दिया गया है। क्या बाकी बचा हिस्सा भी गंवा दिया जाएगा?
Wednesday, August 24, 2011
कचनाध्रुवा क्षेत्र की पहचान
प्राचीन गोड़ राजाओं की रियासत में होगी अब सत्ता की राजनीति
बिंद्रानवागढ़ रियासत के वीर सपूत कचनाध्रुवा को 1903 में बेहतर जमीदारी प्रथा लागू करने के लिए अंग्रेजों के शासनकाल में दिल्ली के लाल किले में एवार्ड से सम्मानित किया गया था। उस समय इस रियासत में 464 ग्राम हुआ करते थे।
पांडुका से लेकर देवभोग तक रियासत का क्षेत्र था। कचनाध्रुवा वीर सपूत का क्षेत्र जनवरी 2012 में नए जिले के रूप में छत्तीसगढ़ के मानचित्र में उभरकर सामने आ जाएगा। गोड़ राजाओं के रियासत में सियासत की राजनीति होगी। प्रस्तावित गरियाबंद नए जिले में राजिम सामान्य, बिंद्रानवागढ़ विधानसभा पड़ेगा। बिंद्रानवागढ़ के नाम से तो तहसील बना है।
उल्लेखनीय है कि कचनाध्रुवा वीर सपूत की महत्ता आज भी वर्षों से बरकरार है। आम लोग इन्हें पूजनीय मानते हैं। जगह-जगह कचनाध्रुवा देवालय के रूप में स्थापित किया गया है। मार्ग से आने-जाने वाले लोग ग्राम बारूका, छुरा मार्ग, नवागढ़, राजपड़ाव के पहले, ध्रुवागुड़ी मार्ग पर स्थित कचनाध्रुवा देवालय में श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। राजधानी मार्ग, छुरा मार्ग, देवभोग मार्ग पर पहाड़ी स्थान पर ही ये देवालय है। गरियाबंद से 12 किमी दूर राजधानी मार्ग के कचनाध्रुवा देवालय में बिजली तक पहुंच गई है। इस नए जिले में कचनाध्रुवा की महत्ता मौजूद रहेगी, बिंद्रानवागढ़ रियासत के कचनाध्रुवा राजा थे। इनके परिवार का फिंगेश्वर स्थित राजमहल शान कहलाएगा। कचनाध्रुवा वीर सपूत की कहानी यह है कि वर्षों तक सियासत की आज भी निशानी है। इनका बिलाई माता से प्रेम संबंध था, बिलाई माता के परिवार ने इसे स्वीकार नहीं करते हुए कचनाध्रुवा का वध कर दिया। इनका सिर और धड़ अलग कर दिया था, चूंकि पटवागढ़ उड़ीसा से कचनाध्रुवा राजा यहां आए थे। ये वहां वीर सैनिक कहलाते थे, इसलिए उड़ीसा के चांदाहड़ी सड़क मार्ग पर कचनाध्रुवा देवालय स्थापित है। वर्तमान गरियाबंद का तहसील दफ्तर, देवभोग, मैनपुर, नवागढ़, पोड़ में रजवाड़ा का मालखाना था, इसमें से कई मालखाना खंडहर में तब्दील हो गया है। बताया जाता है कि नवागढ़ के टीले में चिंड़ा लोगों के साथ सामान्य युद्ध तक हुआ था।
बिंद्रानवागढ़ रियासत के वीर सपूत कचनाध्रुवा को 1903 में बेहतर जमीदारी प्रथा लागू करने के लिए अंग्रेजों के शासनकाल में दिल्ली के लाल किले में एवार्ड से सम्मानित किया गया था। उस समय इस रियासत में 464 ग्राम हुआ करते थे।
पांडुका से लेकर देवभोग तक रियासत का क्षेत्र था। कचनाध्रुवा वीर सपूत का क्षेत्र जनवरी 2012 में नए जिले के रूप में छत्तीसगढ़ के मानचित्र में उभरकर सामने आ जाएगा। गोड़ राजाओं के रियासत में सियासत की राजनीति होगी। प्रस्तावित गरियाबंद नए जिले में राजिम सामान्य, बिंद्रानवागढ़ विधानसभा पड़ेगा। बिंद्रानवागढ़ के नाम से तो तहसील बना है।
उल्लेखनीय है कि कचनाध्रुवा वीर सपूत की महत्ता आज भी वर्षों से बरकरार है। आम लोग इन्हें पूजनीय मानते हैं। जगह-जगह कचनाध्रुवा देवालय के रूप में स्थापित किया गया है। मार्ग से आने-जाने वाले लोग ग्राम बारूका, छुरा मार्ग, नवागढ़, राजपड़ाव के पहले, ध्रुवागुड़ी मार्ग पर स्थित कचनाध्रुवा देवालय में श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। राजधानी मार्ग, छुरा मार्ग, देवभोग मार्ग पर पहाड़ी स्थान पर ही ये देवालय है। गरियाबंद से 12 किमी दूर राजधानी मार्ग के कचनाध्रुवा देवालय में बिजली तक पहुंच गई है। इस नए जिले में कचनाध्रुवा की महत्ता मौजूद रहेगी, बिंद्रानवागढ़ रियासत के कचनाध्रुवा राजा थे। इनके परिवार का फिंगेश्वर स्थित राजमहल शान कहलाएगा। कचनाध्रुवा वीर सपूत की कहानी यह है कि वर्षों तक सियासत की आज भी निशानी है। इनका बिलाई माता से प्रेम संबंध था, बिलाई माता के परिवार ने इसे स्वीकार नहीं करते हुए कचनाध्रुवा का वध कर दिया। इनका सिर और धड़ अलग कर दिया था, चूंकि पटवागढ़ उड़ीसा से कचनाध्रुवा राजा यहां आए थे। ये वहां वीर सैनिक कहलाते थे, इसलिए उड़ीसा के चांदाहड़ी सड़क मार्ग पर कचनाध्रुवा देवालय स्थापित है। वर्तमान गरियाबंद का तहसील दफ्तर, देवभोग, मैनपुर, नवागढ़, पोड़ में रजवाड़ा का मालखाना था, इसमें से कई मालखाना खंडहर में तब्दील हो गया है। बताया जाता है कि नवागढ़ के टीले में चिंड़ा लोगों के साथ सामान्य युद्ध तक हुआ था।
Friday, August 19, 2011
गरियाबंद राजस्व जिला
गरियाबंद राजस्व जिला बनने का सपना साकार हो गया है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने गरियाबंद को जिले की सौगात दे दी है। गरियाबंद के जिला बनने से जनता खुश हैं। चार माह बाद, एक जनवरी 2012 नए वर्ष में गरियाबंद के रूप में नया जिला बन जाएगा। इस पांच ब्लाक के जिले में विकास की बहुत संभावना है। आदिवासी व वनवासियों की उन्नति होगी। यहां के 80 प्रतिशत किसानों का भला होगा। पिछड़ी जनजाति कमार, भुंजिया, लोग विकास की मुख्य धारा से जुड़ेंगे। जिला बनाने की मांग लंबे समय से लंबित थी।
जिले में दो विधानसभा होंगी, राजिम व बिंद्रानवागढ़। वर्तमान में बिंद्रानवागढ़ से डमरूधर पुजारी (भाजपा) व राजिम से अमितेश शुक्ल (कांग्रेस) विधायक हैं। नक्सली चुनौती के बीच विकास का पड़ाव तय करना है। राजनीतिक माहौल भी बदलेगा। बुनियादी समस्याएं हल होंगी। यहां पुलिस जिला मुख्यालय के दफ्तर के अलावा जलसंसाधन, पीडब्लूडी का संभागीय दफ्तर पहले से है। यहां उदंती वनमंडल का कार्यालय है, पूर्व वनमंडल का रायपुर दफ्तर गरियाबंद आ जाएगा। यहां के लोगों को जिले के अफसरों से मिलने 90 किमी दूर नहीं जाना पड़ेगा।जिले की धरोहर मैनपुर, देवभोग के हीरा खदान, एलेक्जेंडर खदान माने जाएंगे। यहां के पायलीखंड, बेहराडीह, कोदोमाली, सेंडमुड़ा में कीमती पत्थर पाए जाते हैं। उदंती अभयारण्य के राजकीय पशु वनभैंसे की एक अलग पहचान होगी। पर्यपर्यटन विकास की संभावना बढ़ गई है। क्षेत्र में धार्मिक महत्व के भूतेश्वरनाथ मंदिर, राजिम कुंभ, जतमई मंदिर, रमईपाठ मंदिर, गरजईमंदिर, घटारानी मंदिर का और विकास होगा। सही मायने में अब अमीर धरती के गरीब लोग विकास के पथ पर आगे बढेंग़े। एक माह पहले विधायक डमरूधर पुजारी ने सीएम डा. सिंह से गरियाबंद को जिला बनाने की मांग की थी। माना जा रहा है कि उनकी मांग रंग लाई।
गरियाबंद जिला क्षेत्रफल की दृष्टि से बड़ा होगा, सड़क मार्ग की दृष्टि से जिले की लंबाई 175 किमी होगी। पहले देवभोग से रायपुर जिले की दूरी 250 किमी थी। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि अब क्षेत्र की जनता की समस्याओं का निपटारा जल्दी होगा। विकास से क्षेत्र की तस्वीर बदलेगी। वैसे तो राज्य निर्माण के पिछले 10 सालों में क्षेत्र का विकास हुआ है। भौगोलिक व प्रशासनिक ढांचे के हिसाब से गरियाबंद अनुविभाग की जनसंख्या 5 लाख से अधिक है। 20890 वर्ग किमी क्षेत्र फल में 5 तहसीलें राजिम, गरियाबंद, मैनपुर, देवभोग, छुरा हैं। इन्हें ब्लाक का दर्जा प्राप्त है। चार नगरपंचायत गरियाबंद, छुरा, फिंगेश्वर, राजिम हैं। इसके अलावा 435 ग्राम पंचायतें, 7 पुलिस थाना, 10 मुख्य चिकित्सालय, 90 बाध, 6 कालेज, अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायालय, अपर कलेक्टर के पद की स्थापना हो चुकी है।
टन विकास की संभावना बढ़ गई है। क्षेत्र में धार्मिक महत्व के भूतेश्वरनाथ मंदिर, राजिम कुंभ, जतमई मंदिर, रमईपाठ मंदिर, गरजईमंदिर, घटारानी मंदिर का और विकास होगा। सही मायने में अब अमीर धरती के गरीब लोग विकास के पथ पर आगे बढेंग़े। एक माह पहले विधायक डमरूधर पुजारी ने सीएम डा. सिंह से गरियाबंद को जिला बनाने की मांग की थी। माना जा रहा है कि उनकी मांग रंग लाई।
गरियाबंद जिला क्षेत्रफल की दृष्टि से बड़ा होगा, सड़क मार्ग की दृष्टि से जिले की लंबाई 175 किमी होगी। पहले देवभोग से रायपुर जिले की दूरी 250 किमी थी। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि अब क्षेत्र की जनता की समस्याओं का निपटारा जल्दी होगा। विकास से क्षेत्र की तस्वीर बदलेगी। वैसे तो राज्य निर्माण के पिछले 10 सालों में क्षेत्र का विकास हुआ है। भौगोलिक व प्रशासनिक ढांचे के हिसाब से गरियाबंद अनुविभाग की जनसंख्या 5 लाख से अधिक है। 20890 वर्ग किमी क्षेत्र फल में 5 तहसीलें राजिम, गरियाबंद, मैनपुर, देवभोग, छुरा हैं। इन्हें ब्लाक का दर्जा प्राप्त है। चार नगरपंचायत गरियाबंद, छुरा, फिंगेश्वर, राजिम हैं। इसके अलावा 435 ग्राम पंचायतें, 7 पुलिस थाना, 10 मुख्य चिकित्सालय, 90 बाध, 6 कालेज, अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायालय, अपर कलेक्टर के पद की स्थापना हो चुकी है।
जिले में दो विधानसभा होंगी, राजिम व बिंद्रानवागढ़। वर्तमान में बिंद्रानवागढ़ से डमरूधर पुजारी (भाजपा) व राजिम से अमितेश शुक्ल (कांग्रेस) विधायक हैं। नक्सली चुनौती के बीच विकास का पड़ाव तय करना है। राजनीतिक माहौल भी बदलेगा। बुनियादी समस्याएं हल होंगी। यहां पुलिस जिला मुख्यालय के दफ्तर के अलावा जलसंसाधन, पीडब्लूडी का संभागीय दफ्तर पहले से है। यहां उदंती वनमंडल का कार्यालय है, पूर्व वनमंडल का रायपुर दफ्तर गरियाबंद आ जाएगा। यहां के लोगों को जिले के अफसरों से मिलने 90 किमी दूर नहीं जाना पड़ेगा।जिले की धरोहर मैनपुर, देवभोग के हीरा खदान, एलेक्जेंडर खदान माने जाएंगे। यहां के पायलीखंड, बेहराडीह, कोदोमाली, सेंडमुड़ा में कीमती पत्थर पाए जाते हैं। उदंती अभयारण्य के राजकीय पशु वनभैंसे की एक अलग पहचान होगी। पर्यपर्यटन विकास की संभावना बढ़ गई है। क्षेत्र में धार्मिक महत्व के भूतेश्वरनाथ मंदिर, राजिम कुंभ, जतमई मंदिर, रमईपाठ मंदिर, गरजईमंदिर, घटारानी मंदिर का और विकास होगा। सही मायने में अब अमीर धरती के गरीब लोग विकास के पथ पर आगे बढेंग़े। एक माह पहले विधायक डमरूधर पुजारी ने सीएम डा. सिंह से गरियाबंद को जिला बनाने की मांग की थी। माना जा रहा है कि उनकी मांग रंग लाई।
गरियाबंद जिला क्षेत्रफल की दृष्टि से बड़ा होगा, सड़क मार्ग की दृष्टि से जिले की लंबाई 175 किमी होगी। पहले देवभोग से रायपुर जिले की दूरी 250 किमी थी। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि अब क्षेत्र की जनता की समस्याओं का निपटारा जल्दी होगा। विकास से क्षेत्र की तस्वीर बदलेगी। वैसे तो राज्य निर्माण के पिछले 10 सालों में क्षेत्र का विकास हुआ है। भौगोलिक व प्रशासनिक ढांचे के हिसाब से गरियाबंद अनुविभाग की जनसंख्या 5 लाख से अधिक है। 20890 वर्ग किमी क्षेत्र फल में 5 तहसीलें राजिम, गरियाबंद, मैनपुर, देवभोग, छुरा हैं। इन्हें ब्लाक का दर्जा प्राप्त है। चार नगरपंचायत गरियाबंद, छुरा, फिंगेश्वर, राजिम हैं। इसके अलावा 435 ग्राम पंचायतें, 7 पुलिस थाना, 10 मुख्य चिकित्सालय, 90 बाध, 6 कालेज, अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायालय, अपर कलेक्टर के पद की स्थापना हो चुकी है।
टन विकास की संभावना बढ़ गई है। क्षेत्र में धार्मिक महत्व के भूतेश्वरनाथ मंदिर, राजिम कुंभ, जतमई मंदिर, रमईपाठ मंदिर, गरजईमंदिर, घटारानी मंदिर का और विकास होगा। सही मायने में अब अमीर धरती के गरीब लोग विकास के पथ पर आगे बढेंग़े। एक माह पहले विधायक डमरूधर पुजारी ने सीएम डा. सिंह से गरियाबंद को जिला बनाने की मांग की थी। माना जा रहा है कि उनकी मांग रंग लाई।
गरियाबंद जिला क्षेत्रफल की दृष्टि से बड़ा होगा, सड़क मार्ग की दृष्टि से जिले की लंबाई 175 किमी होगी। पहले देवभोग से रायपुर जिले की दूरी 250 किमी थी। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि अब क्षेत्र की जनता की समस्याओं का निपटारा जल्दी होगा। विकास से क्षेत्र की तस्वीर बदलेगी। वैसे तो राज्य निर्माण के पिछले 10 सालों में क्षेत्र का विकास हुआ है। भौगोलिक व प्रशासनिक ढांचे के हिसाब से गरियाबंद अनुविभाग की जनसंख्या 5 लाख से अधिक है। 20890 वर्ग किमी क्षेत्र फल में 5 तहसीलें राजिम, गरियाबंद, मैनपुर, देवभोग, छुरा हैं। इन्हें ब्लाक का दर्जा प्राप्त है। चार नगरपंचायत गरियाबंद, छुरा, फिंगेश्वर, राजिम हैं। इसके अलावा 435 ग्राम पंचायतें, 7 पुलिस थाना, 10 मुख्य चिकित्सालय, 90 बाध, 6 कालेज, अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायालय, अपर कलेक्टर के पद की स्थापना हो चुकी है।
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